रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जलौका ( जोंक ) शोधनविधि । चिरन्तनां जलौकान्तु ताम्रपात्रेषु रक्षयेत् । चतुर्माषं निशाचूर्णं जलाष्टकपले क्षिपेत् ॥ ८६ ॥ तस्मिन् क्षिपेज्जलौका च सा योज्या रक्तमोक्षणे८७ पुरानी जोंकोंको लेकर एक तांबेके पात्रमें रक्खो उस पात्रमें चार मासे हलदीका चूर्ण और आठ पल जल डाल देवे इस पानीमें डॉली हुई जोंकोंके मुखसे लार बहने लगती हैं । जब लारें निकल चुकें तो इन जोंकोंको साफकर रक्त निकालनेके लिये लगाना चाहिये ( विशेष वर्णन सुश्रुतसंहिताके तेरहवें अध्यायमें देखो ) ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ त्याज्य जलौका । रोमपृष्ठा च कपिला रक्तरेखा च दुर्बला । वर्जनीया विशेषेण भिषजा कीर्तिमिच्छता ॥ ८८ ॥ यशकी इच्छावाले वैद्यको चाहिये कि रोमोंवाली जोंकें, कपिल वर्णकी जोंकें, लाल लाल रेखावाली जोंकें और दुर्बल या रोगयुक्त, विषैली जोंकें कभी न लगावे ॥ ८८ ॥ इति जलौकाविधि ॥ विधायरेके बीजोंका शोधन । बीजमादौ समादाय रौद्रयन्त्रे विशोषयेत् । ईषत्सैन्धवयुक्तेन द्रवेण यत्नतः सुधीः ॥ अपामार्गस्य वा तौयैर्वाद्धक्यबीजशोधनम् ॥ ८९ ॥ विधायरेके बीज लेकर उनमें सेंधानमकका थोड़ासा पानी डाल मिट्टीके कपालमें अग्निपर मंद अग्निसे पकावे, पानी सूखनेपर बीजोंको उतार ले यह शुद्ध जानने । अथवा अपामार्गके क्वाथमें पकानेसे भी विधायरेके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ८९ ॥