भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (९९) वृद्धदारकबीजन्तु पक्वं दोलाकृतं पचेत् । दुग्धपूर्णेषु पत्रेषु ततः शुद्धयति निश्चितम् ॥ ३९० ॥ अथवा विधायरेके बीजोंको पोटलीमें बांध दूधसे भरे मिट्टीके पात्रमें लटका दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे तो एक प्रहरमें विधायरेके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ३९० ॥ अन्य बीजोंके शोधन । अपामार्गकषायेण निम्बुबीजं विशोधयेत् । शिग्रुकार्पासबीजानि अपामार्गस्य बीजकम् ॥ ९१ ॥ घर्मेण शोधनं तेषां न दद्यात्सैन्धवं ततः । तिक्ता कोषातकी दन्ती पटोली चेन्द्रवारुणी । कटुतुम्बी देवदाली काकतुण्डी च शोधयेत् ॥९२॥ अपामार्गके क्वाथमें स्वेदन करनेसे नींबूके बीज शुद्ध होजाते हैं । सुहाजनेके बीज, कपासके बीज और अपामार्गके बीज इनको प्रातःकाल लेकर धूपमें सुखाना ही इनका शोधन है । इनमें नमकका पानी डालकर शोधन करनेकी आवश्यकता नहीं । कुटकी, कड़वी तोरी, दन्ती (जमालगोटेकी जड़), पटोलकी जड़, इन्द्रायण, कड़वी तुम्बी, देवदाली (बंदालडोडा) और काकतुण्डी इनको धूपमें सुखानेसे ही शुद्ध जानना अर्थात् इनको उचित ऋतुमें प्रातःकाल लाकर धूपमें सुखाकर रक्खे जिस योगमें डालना हो डालकर प्रयोग करे ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ धात्रीफलरसेनैव महाकालस्य शोधनम् । करञ्जयुग्मयोर्बीजं भृंगराजेन शोधयेत् ॥ ९३ ॥ महाकाल (कालादाना) आमलोंके रसकी भावना देनेसे शुद्ध होजाता है । दोनों प्रकारके करंजुएके बीजोंकी गिरीको भांगरेके रसमें भावना देनेसे करंजबीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥