रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
४. चतुर्थ-पञ्चम अध्याय: कुष्ठ, प्रमेह, विसर्प, विष-चिकित्सा, रसायन-वाजीकरण एवं उपसंहार
भाषाटीकासहित । ( ४१६ ) लेवे इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका प्रमेह रोग नष्ट होता है । इसको हरिशंकर रस कहते हैं ॥ १ ॥ इन्द्रवटी । मृतं सूतं मृतं वङ्ग-मर्जुनस्य त्वचान्वितम् । तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले शाल्मल्या मूलजैर्द्रवैः ॥ २ ॥ दिनान्ते वटिका कार्या माषमात्रा प्रमेहहा । एषा इन्द्रवटी नाम्ना मधुमेहप्रशान्तिकृत् ॥ ३ ॥ रससिन्दूर, वंगभस्म और अर्जुनवृक्षकी छाल समान भाग लेकर सेमलकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेह और मधुमेह नष्ट होता है ॥ २ ॥ ३ ॥ वङ्गावलेह । वंगभस्म द्विवल्लञ्च लेहयेन्मधुना सह । ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ ४ ॥ गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा । सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ ५ ॥ चार रत्ती परिमाण वंगकी भस्मको सहतमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे एक कर्ष परिमाण गुड़ और गंधक भक्षण करे । अथवा एक तोला गिलोयका सत और मिश्री दोनोंको एकत्र मिलाकर भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेहरोग दूर होता है । इसको वंगावलेह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रमेहसेतु । सूताभ्रञ्च वटक्षीरैर्मर्दयेत्प्रहरद्वयम् । विशोष्य पक्वमूषायां सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ६ ॥
( ४१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विशेषान्मेहरोगेषु त्रिफलामधुसंयुक्तम् । युञ्जीत वल्लमेकन्तु रसेन्द्रस्यास्य वैद्यराट् ॥ ७ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर बड़के दूधमें दो प्रहरतक खरल करके मूषामें रखकर मंद मंद अग्निसे पकावें । इस औषधिका सब रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । प्रमेह रोगमें इस औषधिको दो रत्ती लेकर त्रिफलेके रसके साथ और सह- तके साथ सेवन करे । इसको प्रमेहसेतु रस कहते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ विडंगाद्य लोह । विडङ्गत्रिफलामुस्तैः कणया नागरेण च । जीरकाभ्यां युतं हन्ति प्रमेहानतिदारुणान् ॥ लौहं मूत्रविकारांश्च सर्वानैव विनाशयेत् ॥ ८ ॥ वायविडंग, हरड़, बहेड़ा, आमला, नागरमोथा, पीपल, सोंठ, जीरा और कालाजीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे प्रमेह और सब प्रकारके मूत्ररोग नष्ट होते हैं । इसको विडंगाद्य लोह कहते हैं ॥ ८ ॥ बृहत् हरिशंकर रस । रसगन्धकलौहञ्च स्वर्णं वङ्गञ्च माक्षिकम् । समभागं तु संपिष्य वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ९ ॥ सप्ताहमामलद्रावैर्भावितोऽयं रसेश्वरः । हरिशङ्करनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ प्रमेहान् विंशतिं हन्ति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१०॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म और सोना- माखीभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आमलोंके रसमें
भाषाटीकासहित । ( ४१७ ) सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । यह बृहत् हरिशंकर रस गहनानन्दने कहा है ॥ ९ ।। १० ॥ आनन्दभैरव रस । वङ्गभस्म मृतं स्वर्णं रसं क्षौद्रैर्विमर्दयेत् । द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं हन्ति मेहं चिरोद्भवम् । गुञ्जामूलं तथा क्षौद्रैरनुपानं प्रशस्यते ॥ ११ ॥ वंगभस्म, सोनाभस्म और रससिन्दूर इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें मिलाकर दो रत्ती परिमाण नित्य खावे । इससे बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह नष्ट होजाता है। इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् गुंजाकी जड़को सहतमें मिलाकर भक्षण करे । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ११ ॥ विद्यावागीश रस । मृतसूताभ्रनागञ्च स्वर्णं तुल्यं प्रकल्पयेत् । महानिम्बस्य चूर्णं तु चतुर्भिः सममाहरेत् ॥ १२ ॥ मधुना लेहयेन्माषं लालामेहप्रशान्तये । सक्षौद्रं रजनीचूर्णं लेह्यं निष्कद्वयं तथा ॥ असाध्यं नाशयेन्मेहं विद्यावागीशको रसः ॥ १३ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, सीसाभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, बकायनका चूर्ण ४ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके एक मासे सहतके साथ सेवन करनेसे लालामेह नष्ट होता है। इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् छः मासे हल्दीके चूर्णको सहतमें मिलाकर चाटे । इसके सेवन करनेसे असाध्य प्रमेहरोग भी नष्ट हो जाता है । इसको विद्यावागीश रस कहते हैं ॥१२॥१३॥
( ४१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मेहमुद्गर रस । रसाञ्जनं विडं दारु बिल्वगोक्षुरदाडिमम् । भूनिम्बं पिप्पलीमूलं त्रिकटु त्रिफला त्रिवृत् ॥ १४ ॥ प्रत्येकं तोलकं देयं लौहचूर्णन्तु तत्समम् । पलैकं गुग्गुलुं दत्त्वा घृतेन वटिकां कुरु ॥ १५ ॥ माषैका निर्मिता चेयं मेहमुद्गरसंज्ञिनी । श्रीमद्गहननाथेन लोकनिस्तारकारिणा ॥ १६ ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं छागीदुग्धं जलञ्च वा । मेहांश्च विंशतिं हन्ति मूत्रकृच्छ्रं हलीमकम् ॥ १७ ॥ अश्मरीं कामलां पाण्डुं मूत्राघातमरोचकम् । अर्शांसि व्रणकुष्ठञ्च वातरक्तं भगन्दरम् ॥ १८ ॥ रसौत, विरियासेंचरनमक, दारुहलदी, बेलकी छाल, गोखुरुके बीज, अनारका बक्कल, चिरायता, पीपलामूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल और निसोध यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, गूगल ४ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृतमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । बकरीके दूध अथवा जलके साथ इस औष- धिके सेवन करनेसे बीस प्रकारका प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, हलीमक, अश्मरी, कामला, पाण्डु, मूत्राघात, अरुचि, बवासीर, व्रण, कुष्ठ, वातरक्त और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं । यह मेहमुद्गर रस श्रीमान् गहना- नन्दनाथने कहा है ॥ १४–१८ ॥ मेघनादरस । भस्म सूतं समं कान्तमभ्रकन्तु शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषत्रिफलांकोठजीरकम् ॥ १९ ॥
भाषाटीकासहित । (४१९) कार्पासबीजं रजनीचूर्णं भाव्यञ्च वह्निना । विंशतिधा विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ माषमात्रं हरेन्मेहं मेघनादरसो महान् ॥ २० ॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, अभ्रक, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मैनाशल, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला, अंकोलकी जड़, जीरा, कपासके बीज और हल्दी इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रककी जड़के रसमें बीस वार भावना देवे । इसमेंसे एक मासा परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर चाटनेसे मेहरोग नष्ट होता है । इसको मेघनाद रस कहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ चन्द्रप्रभा वटी । मृतसूताभ्रकं लोहं नागं वङ्गं समं समम् । एलाबीजं लवङ्गञ्च जातीकोषफलं तथा ॥ २१ ॥ मधूकं मधुयष्टिश्च धात्री च समशर्करा । कर्पूरं खादिरं सारं शताह्वा कण्टकारिका ॥ २२ ॥ अम्लवेतसकं तुल्यं दिनैकं लाङ्गलीद्रवैः । भावयेन्मेषदुग्धेन नागवल्लया रसैर्दिनम् ॥ २३ ॥ वटिका बदरास्थ्याभा कार्या चन्द्रप्रभा परा । भक्षयेद्वटिकामेकां सर्वमेहकुलान्तिकाम् ॥ २४ ॥ धात्रीपटोलपत्रं वा कषायं वामृतायुतम् । सक्षौद्रं भक्षयेच्चानु सर्वमेहप्रशान्तये ॥ २५ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, सीसाभस्म, वंगभस्म, इला- यची, लौंग, जावित्री, जायफल, महुवेके फूल, मुलैठी, आमले, मिश्री, कपूर, खैरसार, सौंफ, कटेरी और अमलवेत इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर कलिहारीकी जड़के रसमें एक दिन, भेड़के
( ४२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूधमें एक दिन और पानोंके रसमें एक दिन भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना ले । इन गोलियोंमेंसे नित्य एक गोली सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें आमले और पटोलपत्र तथा गिलोयके क्वाथमें सहत मिलाकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं ॥ २१-२५ ॥ इक्षुमेहपर वंगेश्वर रस । रसभस्मसमायुक्तं वङ्गभस्म प्रकल्पयेत् । अस्य माषद्वयं हन्ति मेहान्क्षौद्रसमन्वितम् ॥ २६ ॥ रससिन्दूर और वंगभस्म इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दो मासे परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके प्रमेहरोग नष्ट होते हैं । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ बृहद्वङ्गेश्वर रस । वंगभस्म रसं गन्धं रौप्यं कर्पूरमभ्रकम् । कर्षं कर्षं मानमेषां सूतांघ्रि हेम मौक्तिकम् ॥ २७ ॥ केशराजरसैर्भाव्यं द्विगुञ्जाफलमानतः । प्रमेहान्विंशतिश्चैव साध्यासाध्यमथापि वा ॥ २८ ॥ मूत्रकृच्छ्रं तथा पाण्डुं धातुस्थञ्च ज्वरं जयेत् । हलीमकं रक्तपित्तं वातपित्तकफोद्भवम् ॥ २९ ॥ ग्रहणीमामदोषञ्च मन्दाग्नित्वमरोचकम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३० ॥ बृहद्वङ्गेश्वरो नाम सोमरोगं निहन्त्यलम् । बहुमूत्रं बहुविधं मूत्रमेहं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ मूत्रातिसारं कृच्छ्रञ्च क्षीणानां पुष्टिवर्द्धनः । ओजस्तेजस्करो नित्यं स्त्रीषु सम्यग्वृषायते ॥ ३२ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४२१ ) बलवर्णकरो रुच्यः शुक्रसञ्जननः परः । छागं वा यदि वा गव्यं पयो वा दधि निर्मलम्॥३३॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषगतिं भिषक् । दद्याच्च बाले प्रौढे च सेवनार्थं रसायनम् ॥ ३४ ॥ वंगभस्म, पारा, गन्धक, रूपाभस्म, कपूर और अभ्रकभस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे । सोनाभस्म और मोती प्रत्येक चार चार मासे; इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कुकुरभांगरेके रसमें सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य बीस प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पांडु, धातुगत ज्वर, हलीमक, वातपित्त, कफोत्पन्न रक्तपित्त, संग्रहणी, आमदोष, मन्दाग्नि और अरुचि प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । तथा सोमरोग, बहुमूत्ररोग, घोरतर मूत्रमेह, मूत्रातिसार और मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होते हैं । क्षीणमनुष्यको पुष्टि उत्पन्न होती है । ओज और तेजकी वृद्धि होती है । स्त्री प्रसंगमें उत्तम शक्ति उत्पन्न होती है । तथा बल, वर्ण, रुचि और शुक्र उत्पन्न होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें दोषोंका बलाबल विचार कर बकरीका दूध अथवा गायके दूधको पान करे, अथवा स्वच्छ दही पीवे । यह औषधि बालक और प्रौढ मनुष्यको सेवन करानी चाहिये । इसको बृहद्वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ २७-३४ ॥ वङ्गाभ्रमथ नागाभ्रं नागं वङ्गञ्च केवलम् । मेहरोगे प्रयोक्तव्यं शिलाजतुसमन्वितम् ॥ ३५ ॥ अन्य योग-वंग और अभ्रक, अथवा सीसा और अभ्रक, अथवा केवल सीसा या वंगको शिलाजीतके साथ सेवन करनेसे प्रमेहरोग नष्ट होता है ॥ ३५ ॥
( ४२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कस्तूरीमोदक । कस्तूरी वनिता क्षुद्रा त्रिफला जीरकद्वयम् । एलाबीजं त्वचं यष्टिमधुकं मिषि वालकम् ॥ ३६ ॥ शतपुष्पोत्पलं धात्री मुस्तकं भद्रसंज्ञकम् ॥ कदलीनां फलं पक्वं खर्जूरं कृष्णतिल्वकम् ॥ ३७ ॥ कोकिलाख्यस्य बीजञ्च माषमात्रं समं समम् । यावन्त्येतानि चूर्णानि द्विगुणा सितशर्करा ॥ ३८ ॥ धात्रीरसेन पयसा कूष्माण्डस्वरसेन च । विषचेत्पाकविद्वैद्यो मन्दमन्देन वह्निना ॥ ३९ ॥ अवतार्य सुशीते च यथालाभं विनिःक्षिपेत् । अक्षमात्रं प्रयुञ्जीत सर्वमेहप्रशान्तये ॥ ४० ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । सोमरोगं बहुविधं मूत्रातीसारमुल्बणम् ॥ ४१ ॥ मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्याशु मूत्राघातं तथाश्मरीम् । ग्रहणीं पाण्डुरोगञ्च कामलां कुम्भकामलाम् ॥ ४२ ॥ वृष्यो बलकरो हृद्यः शुक्रवृद्धिकरः परः । कस्तूरीमोदकश्चायं चरकेण च भाषितः ॥ ४३ ॥ कस्तूरी, फूलप्रियंगू, कटेरी, हरड़, बहेड़ा, आमला, जीरा, काला जीरा, इलायची, दालचीनी, मुलैठी, सौंफ, सुगन्धवाला, सोयाके बीज, कमल, आमले, नागरमोथा, पकी केलाकी फली, खजूर, काले तिल और तालमखाने यह प्रत्येक औषधि एक एक मासे लेवे और सब औषधियोंसे दुगुनी मिश्री लेवे तथा आमलोंका रस, दूध और भेटेका रस यह तीनों वस्तु सब औषधियोंसे चौगुनी लेवे । इन सब
भाषाटीकासहित । ( ४२३ ) औषधियोंको एकत्र पीसकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पाक तैयार होजाय तब एक एक तोलेके लड्डू बना लेवे । प्रतिदिन एक मोदक खाय, इससे सब प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं । इसके सेवन करनेसे वाजत, पित्तज, कफज और त्रिदोषज सब प्रकारका सोमरोग शमन होता है । इससे अनेक प्रकारका मूत्रातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, संग्रहणी, पाण्डु, कामला और कुम्भकामला रोग दूर होता है । यह अत्यन्त वीर्य्यको बढ़ानेवाला, बलकारक, हृदयको हितकारी और वीर्य्यको बढ़ानेवाला है । यह कस्तूरीमोदक चरक ऋषि ने कहा है ॥ ३६-४३ ॥ मेहवज्र । भस्मसूतं मृतं कान्तलौहभस्म शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषं त्रिफलाबिल्वजीरकम् ॥४४॥ कपित्थं रजनीचूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत् । त्रिंशद्वारं विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ ४५ ॥ निष्कमात्रं हरेन्मेहान्मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् । महानिम्बस्य बीजञ्च षण्निष्कं पेषितञ्च यत् ॥४६॥ पलं तण्डुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च । एकीकृत्य पिबेच्चानु हन्ति मेहं चिरोत्थितम् ॥४७॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मनशिल, सोंठ, पीपल, काली मिरच हरड़, बहेडा, आमला, बेलकी छाल, जीरा, कैथ और हल्दी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर भांगरेके रसमें तीस भावना देकर चार चार मासेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रमेह और मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें दो तोले बकायनके बीजोंको चार तोले चावलोंके जलमें पीसकर एक तोला घृत मिलाकर सेवन करे, इससे बहुत दिनोंका प्रमेह रोग दूर होता है ॥ ४४-४७ ॥
( ४२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुमारी केवला देया चेषल्लवणसंयुता । प्रमेहं हन्ति सकलं सप्ताहात्परतो नृणाम् ॥ ४८ ॥ अथवा केवल एक घीकारके रसमें किंचित् नमक मिलाकर सेवन करनेसे एक सप्ताहमें सब प्रकारका प्रमेह रोग दूर होता है ॥ ४८ ॥ मेहकेशरी । मृतवङ्गं सुवर्णञ्च कान्तलौहञ्च पारदम् । मुक्ता गुडत्वचञ्चैव सूक्ष्मैलापत्रकेशरम् ॥ ४९ ॥ समभागं विचूर्ण्याथ कन्यानीरेण भावयेत् । द्विमाषां वटिकां खादेद्दुग्धान्नं प्रपिबेत्ततः ॥ ५० ॥ प्रमेहं नाशयत्याशु केसरी करिणं यथा । शुक्रप्रवाहं शमयेत्त्रिरात्रान्नात्र संशयः ॥ चिरजातं प्रवाहञ्च मधुमेहञ्च नाशयेत् ॥ ५१ ॥ वंगभस्म, सोनाभस्म, कान्तलोहभस्म, रससिन्दूर, मोती, दाल- चीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेशर इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर घीकारके रसमें सात भावना देकर दो दो मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेपर दूधके साथ भात खावे । जिस प्रकार सिंह हस्तियोंके समूहको नष्ट करता है उसी प्रकार यह औषधि भी प्रमेहके समूहको नष्ट करती है । इसके सेवन करनेसे तीन दिनमें शुक्रका बहना बंद हो जाता है तथा बहुत दिनोंका प्रमेह और मधुमेह नष्ट होता है । इसको मेहकेशरी रस कहते हैं ॥४९-५१ योगेश्वर रस । सूतकं गन्धकं लौहं नागञ्चापि वराटिकाम् । ताम्रकं वंगभस्मापि व्योमकञ्च समांशकम् ॥ ५२ ॥ सूक्ष्मैलापत्रमुस्तञ्च विडङ्गं नागकेशरम् । रेणुकामलकञ्चैव पिप्पलीमूलमेव च ॥ ५३ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४२५ ) एषाञ्च द्विगुणं भागं मर्दयित्वा प्रयत्नतः । भावना तत्र दातव्या धात्रीफलरसेन च ॥ ५४ ॥ मात्रा चणकतुल्या च गुटिकेयं प्रकीर्तिता । प्रमेहं बहुमूत्रञ्च अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रकम् ॥ ५५ ॥ व्रणं हन्ति महाकुष्ठमर्शांसि च भगन्दरम् । योगेश्वरो रसो नाम महादेवेन भाषितः ॥ ५६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे प्रमेहाधिकारः । पारा, गंधक, लोहभस्म, सीसाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तांबाभस्म, वंगभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; छोटी इलायची, तेजपात, नागरमोथा, वायविडंग, नागकेशर, रेणुका, आमले और पीपलामूल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग ले । इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर आमलोंके रसकी सात भावना देकर चनेकी बरा- बर गोली बना ले । इस औषधिके सेवन करनेसे प्रमेह, बहुमूत्र, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, व्रण, महाकुष्ठ, बवासीर और भगन्दर रोग दूर होते हैं । इस योगेश्वर रसको स्वयं महादेवने कहा है ॥ ५२–५६ ॥ इति प्रमेहाधिकार सम्पूर्ण । अथ सोमरोगचिकित्सा । तालकेश्वर रस । तालं सूतं समं गन्धं मृतलौहाभ्रवङ्गकम् । मर्दयेन्मधुना चैव रसोऽयं तालकेश्वरः ॥ १ ॥ माषमात्रं भजेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये । उदुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमानतः ॥ संलेह्यं मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥ २ ॥
( ४२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हरिताल, पारा, गंधक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और वंगभस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें पीसकर एक मासे परि- माण लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे एक कर्ष परि- माण गूलरका चूर्ण सहतमें मिलाकर खावे। इसके सेवन करनेसे बहुमूत्र रोग दूर होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गगनादि लोह । गगनं त्रिफला लौहं कुटजं कटुकत्रयम् । पारदं गन्धकञ्चैव विषटङ्गणसर्जिकाः ॥ ३ ॥ त्वगेला तेजपत्रञ्च वङ्गं जीरकयुग्मकम् । एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ४ ॥ तदर्द्धं चित्रकं चूर्णं कर्षैकं मधुना लिहेत । अवश्यं विनिहन्त्याशु मूत्रातीसारसोमकम् ॥ ५ ॥ अभ्रकभस्म, हरड़, बहेड़ा, आमले, लोहभस्म, कुड़ेकी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, पारा, गंधक, विष, सुहागा, सज्जी, दालचीनी, इलायची, तेजपात, वंगभस्म, जीरा और काला जीरा इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक भाग, चित्रककी जड़का चूर्ण आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक कर्ष परिमाण सहतमें मिलाकर सेवन करे तो मूत्रातिसार और सोमरोग नष्ट होते हैं । इसको गगनादिलोह कहते हैं ॥ ३–५ ॥ सोमनाथ रस । कर्षं जारितलौहञ्च तदर्द्धं रसगन्धकम् । एलापत्रं निशायुग्मं जम्बुवीरणगोक्षुरम् ॥ ६ ॥ विडङ्गं जीरकं पाठा धात्री दाडिमटंकणम् । चन्दनं गुग्गुलुं लोध्रशालार्जुनरसाञ्जनम् ॥ ७ ॥
भाषाटीकासहित । (४२७) छागीदुग्धेन वटिकां कारयेद्दशरक्तिकाम् । निर्मितो नित्यनाथेन सोमनाथरसस्त्वयम् ॥ ८ ॥ सोमरोगं बहुविधं प्रदरं हन्ति दुर्जयम् । योनिशूलं मेढ्रशूलं सर्वजं चिरकालजम् ॥ बहुमूत्रं विशेषेण दुर्जयं हन्त्यसंशयः ॥ ९ ॥ जारित लोहा १ कर्ष परिमाण, पारा, गन्धक, इलायची, तेजपात, हलदी, दारुहलदी, जामुनकी छाल, खस, गोखुरु, वायविडंग, जीरा, पाठ, आमले, अनार, सुहागा, लालचन्दन, गूगल, लोध, झाल, अर्जुन और रसौत इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर दश दश रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे अनेक प्रकारका सोमरोग, दुर्जय प्रदर रोग, योनिशूल, लिंगशूल, त्रिदोषज शूल, बहुकालजात शूल और घोरतर मूत्ररोग दूर होते हैं । इसको नित्यनाथने कहा है ॥ ६-९ ॥ बृहत्सोमनाथ रस । हिंगुलसम्भवं सूतं पालिधारसमर्दितम् । रण्डाशोधितगन्धञ्च तेनैव कज्जलीकृतम् ॥ १० ॥ तद्द्वयोर्द्विगुणं लौहं कन्यारसविमर्दितम् । अभ्रकं वंगकं रौप्यं खर्परं माक्षिकन्तथा ॥ ११ ॥ सुवर्णञ्च समं सर्वं प्रत्येकञ्च रसाद्धिकम् । तत्सर्वं कन्याद्रावैर्मर्दयेद्भावयेत् ततः ॥ १२ ॥ भेकपर्णीरसेनैव गुञ्जाद्वयवटीं ततः । मधुना भक्षयेच्चापि सोमरोगनिवृत्तये ॥ १३ ॥ प्रमेहान्विंशतिं हन्ति बहुमूत्रञ्च सोमकम् । मूत्रातिसारं कृच्छ्रञ्च मूत्राघातं सुदारुणम् ॥ १४ ॥
(४२८) रसेन्द्रसारसंग्रह । बहुदोषं बहुविधं प्रमेहं मधुसंज्ञकम् । हस्तिमेहमिक्षुमेहं लालामेहं विनाशयेत् ॥ १५ ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सोमसंज्ञकम् । नाशयेद्बहुमूत्रञ्च प्रमेहमविकल्पतः ॥ १६ ॥ सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ और फरहदके रसमें शुद्ध किया हुआ पारा १ भाग और मूषाकानीके रसमें शुद्ध किया हुआ गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर इस कज्जलीमें घीक्वारके रसमें शुद्ध किया हुआ लोहाभस्म ४ भाग तथा अभ्रकभस्म, वंगभस्म, रूपाभस्म, खपरिया, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा भाग मिलाकर घृतकुमारीके रसमें खरल करके सात वार भावना देवे । पश्चात् मण्डूकपर्णीके रसमें खरल कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । सोमरोगको दूर करनेके लिये इन गोलियोंको सहतमें मिलाकर सेवन करे । इस औषधिके भक्षण करनेसे बीस प्रकारके प्रमेह, बहुमूत्र, सोमरोग, मूत्रातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, बहुत दोष, बहुत प्रकारका मधुमेह, हस्तिमेह, इक्षुमेह, लाला- मेह और अन्यान्य सब प्रकारके प्रमेहरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहत्सोमनाथ रस कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ सोमेश्वर रस । शालार्जुनं लोध्रकञ्च कदम्बागुरुचन्दनम् । अग्निमन्थं निशायुग्मं धात्रीदाडिमगोक्षुरम् ॥ १७ ॥ जम्बुवीरणमूलञ्च भागमेषां पलार्द्धकम् । रसगन्धकधान्याब्दमेलापत्रं तथाभ्रकम् ॥ १८ ॥ लौहं रसाञ्जनं पाठा विडङ्गं टङ्कजीरकम् । प्रत्येकं पलिकं भागं पलार्द्धं गुग्गुलोरपि ॥ १९ ॥
भाषाटीकासहित । (४२९) घृतेन वटिकां कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम् । गहनानन्दनाथेन रसो यत्नेन निर्मितः ॥ २० ॥ सोमेश्वरो महातेजाः सोमरोगं निहन्त्यलम् । एकजं द्वन्द्वजञ्चैव सन्निपातसमुद्भवम् ॥ २१ ॥ मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं कामलाञ्च हलीमकम् । भगन्दरोपदंशौ च विविधान्पिडिकाव्रणान् । विस्फोटार्बुदकण्डूं च सर्वमेहं विनाशयेत् ॥ २२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे सोमरोगाधिकारः । राल, अर्जुनकी छाल, लोध, कदमकी छाल, अगर, लाल चन्दन, अरणी, हल्दी, दारुहल्दी,आमले, अनारका बक्कल, गोखुरूके बीज, जामुनकी छाल और खस यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । पारा, गन्धक, धनिया, नागरमोथा, इलायची, तेजपात, अभ्रक, लोह- भस्म, रसौंत, पाठ, वायविडंग, सुहागा और जीरा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेवे और गूगल २ तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके घीमें पीसकर सोलह २ रत्तीकी गोली बना लेवे । अत्यंत तेजवाली इस औषधिके सेवन करनेसे एकदोषज, द्विदोपज, त्रिदोषज और सन्निपातज, सोमरोग, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, कामला, हलीमक, भगन्दर, उपदंश, अनेक प्रकारका व्रण और पिडिका, विस्फोटक, अर्बुद, कण्डू और सर्व प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं । इस सोमेश्वर रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ १७–२२ ॥ इति सोमरोगचिकित्सा । १५ ।
( ४३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ स्थौल्याधिकार । त्र्यूषणाद्यलोह । त्र्यूषणं विजया चव्यं चित्रकं विडमौद्भिदम् । वागुजी सैन्धवञ्चैव सौवर्चलसमन्वितम् ॥ १ ॥ अयश्चूर्णेन संयुक्तं भक्षयेन्मधुसर्पिषा । स्थौल्यापकर्षणं श्रेष्ठं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ २ ॥ मेहघ्नं कुष्ठशमनं सर्वव्याधिहरं परम् । नाहारे यन्त्रणा कार्या न विहारे तथैव च ॥ त्र्यूषणाद्यमिदं लौहं रसायनवरोत्तमम् ॥ ३ ॥ त्रिकुटा, भांग, चव्य, चित्रककी जड़, विडनमक, औद्भिदलवण, बावचीके बीज, सेंधानमक और कालानमक यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मेदरोग नष्ट होता है । बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रमेह, कुष्ठ और समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार विहार करे ॥ १-३ ॥ वडवाग्निलोह । सूतभस्म सतालञ्च लौहं ताम्रं समं समम् । मर्दयेत्सूर्यपत्रेण चास्य वल्लं प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥ मधुना स्थूलरोगे च शोथे शूले तथैव च । मध्वाज्यमनुपानञ्च देयं वापि कफोल्वणे ॥ ५ ॥ रससिन्दूर, हरितालभस्म, लोहाभस्म और तांबाभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । मेदरोग, शोथ और शूलरोगमें इस औषधिको
भाषाटीकासहित । (४३१) सहतमें मिलाकर सेवन करे । तथा कफोल्बण रोगमें सहत और घृतके साथ भक्षण करे । इसको वडवाग्नि लोह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ वडवाग्निरस । शुद्धसूतं समं गन्धं ताम्रं तालं समं समम् । अर्कक्षीरैर्दिनं मद्यं क्षौद्रैर्लेह्यं द्विगुञ्जकम् ॥ वडवाग्निरसो नाम्ना स्थौल्यमाशु नियच्छति ॥ ६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे स्थौल्याधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, तांबाभस्म और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके दूधमें एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे स्थूलता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ ६ ॥ इति स्थौल्याधिकार समाप्त । अथ उदररोगाधिकार । त्रैलोक्यसुन्दर रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं ताम्राभ्रं सैन्धवं विषम् । कृष्णजीरं विडङ्गञ्च गुडूचीसत्त्वचित्रकम् ॥ १ ॥ उग्रगन्धा यवक्षारं प्रत्येकं कर्षमात्रकम् । निर्गुण्डिकाद्रवैश्चग्निबीजपूरद्रवैर्दिनम् ॥ २ ॥ मर्दयेच्छोषयेत्सोऽयं रसस्त्रैलोक्यसुन्दरः । गुञ्जाद्वयं घृतैर्लेह्यं वातोदरकुलान्तकम् ॥ ३ ॥ वह्निचूर्णं यवक्षारं प्रत्येकञ्च पलद्वयम् । घृतंप्रस्थं विपक्तव्यं गोमूत्रैश्च चतुर्गुणैः ॥ घृतावशेषं कर्त्तव्यं कर्षमात्रं पिबेदनु ॥ ४ ॥
( ४३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा १ तोले, गंधक २ तोले तथा तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, सेंधानमक, विष, काला जीरा, वायविडंग, गिलोयका सत, चित्रककी जड़, वच और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हालूके पत्तोंके रस, चित्रककी जड़के रस और बिजौरे नींबूके रसमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, इस औषधिको घृतमें मिलाकर चाटनेसे वातोदर रोग नष्ट होता है। चित्रककी जड़का चूर्ण २ पल और जवाखार २ पल, घृत १ प्रस्थ और गोमूत्र ४ प्रस्थ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर यथाविधिसे पकावे । जब केवल घृत बाकी रह जाय तब उतार लेवे । इस औषधिक सेवन करनेके पश्चात् इस घृतको पान करे । इसको त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ वैश्वानरी वटी । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मृताकार्य्यःशिलांजतु । रसमानं प्रदातव्यं रसस्य द्विगुणं विषम् ॥ ५ ॥ त्रिकटु चित्रकं वीरा निर्गुण्डी मूसलीरजः । अजमोदा विषांशेन प्रत्येकञ्च नियोजयेत् ॥ ६ ॥ निम्बपञ्चांगुलक्वाथैर्भावनाश्चैकविंशतिः । भृङ्गराजरसैः सप्त दत्त्वा क्षौद्रैर्विलोडयेत् ॥ ७ ॥ भक्षयेद्बदरास्थ्याभां वटिकां तां दिवानिशि । श्लेष्मोदरं निहन्त्याशु नाम्ना वैश्वानरी वटी ॥ ८ ॥ देवदारुवह्निमूलकल्कं क्षीरेण पाययेत् । भोजनं मेषदुग्धेन कुलत्थानां रसेन तु ॥ ९ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, तांबाभस्म, लोहाभस्म और शिला- जीत यह प्रत्येक एक एक भाग, विष २ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, क्षीरकाकोली, सम्हालूके पत्ते, मूसली और अजवायन
भाषाटीकासहित । (४३३) यह प्रत्येक दो दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके नीमके पत्तोंके रसमें इक्कीस २१ बार, एरण्डकी जड़के क्वाथमें २१ बार और भांगरेके रसमें सात भावना देकर बेरकी गुठली बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि दिनमें एकबार और रात्रिमें एकबार सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे श्लेष्मोदर-रोग नष्ट होता है । इस औषधिके भक्षण करनेके अन्तमें देवदारु और चित्रककी जड़का चूर्ण समान भाग लेकर पीसकर दूधके साथ सेवन करे । इसपर भेड़के दूध और कुलथीके क्वाथके साथ भात खाये । इसको वैश्वानरी वटी कहते हैं ॥ ५-९ ॥ जलोदरारि रस । पिप्पली मरिचं ताम्रं रजनीचूर्णसंयुतम् । स्नुहीक्षीरैर्दिनं मद्यं तुल्यं जैपालबीजकम् ॥ १० ॥ निष्कं खादेद्विरेकं स्यात्सद्यो हन्ति जलोदरम् । रेचनानाञ्च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम् ॥ दिनान्ते च प्रदातव्यमन्नं वा मुद्गयूषकम् ॥ ११ ॥ पीपल, कालीमिरच, तांबाभस्म और हलदी इन सब औषधि- योंका चूर्ण समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । और फिर उसमें सब औषधिकी बराबर शुद्ध जमालगोटेका चूर्ण मिलाकर एक वार दो मासे परिमाण सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होकर जलोदर रोग नष्ट होता है । विरेचनको रोकनेके लिये इस पर दहीके साथ भात हितकारी है । अतएव इस औष- धिके सेवन करनेपर जब अच्छे प्रकारसे दस्त होजायँ तब संध्याके समय दहीके साथ भात खाय । अथवा मूंगके यूषके साथ भात खाय । इसको जलोदरारि रस कहते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥
( ४३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वह्निरस । सूतस्य गन्धकस्याष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः । प्रत्येकञ्च द्विभागं स्यात्त्रिवृज्जैपालचित्रकम् ॥ १२ ॥ प्रत्येकञ्च त्रिभागञ्च व्योषं दन्तिकजीरकम् । प्रत्येकं सप्तभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ १३ ॥ जयन्ती स्नुकपयो भृंगवह्निवातारितैलकैः । प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक् पृथक् ॥ १४ ॥ असौ वह्निरसो नाम्ना निष्कमुष्णजलैः पिबेत् । विरेचनं भवेत्तेन तक्रभक्तं ससैन्धवम् ॥१५॥ दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् । सर्वोदरहरः प्रोक्तः श्लेष्मवातहरः परः ॥ १६ ॥ पारा ८ भाग, गंधक ८ भाग, हलदी, हरड़, बहेड़ा, आमला और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग, निसोथकी जड़, जमालगोटे और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि तीन तीन भाग, सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीके बीज और जीरा यह प्रत्येक औषधि सात सात भाग लेवे । सबको एकत्र पीसकर जयंतीके पत्तोंके रस, थूहरके दूध, भांगरेके रस, चित्रककी जड़का रस और एरण्डीके तेलमें अलग अलग सात सात भावना देकर ४ मासे परिमाण औषधि गरम जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होगा । दिनके अंतमें तक्र, भात और सेंधानमक मिलाकर पथ्य देवे । इसके सेवन करनेपर शीतल जलको त्याग देवे । इससे सब प्रकारके उदररोग और वातकफोत्पन्न रोग नष्ट होते हैं । इसको वह्निरस कहते हैं १२-१६॥ त्रैलोक्यडुम्बर रस । द्वौ भागौ शिवबीजस्य गन्धकस्य चतुष्टयम् । अभ्रवह्निविडङ्गानां गुडूचीसत्त्वनागयोः ॥१७॥