रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४२८) रसेन्द्रसारसंग्रह । बहुदोषं बहुविधं प्रमेहं मधुसंज्ञकम् । हस्तिमेहमिक्षुमेहं लालामेहं विनाशयेत् ॥ १५ ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सोमसंज्ञकम् । नाशयेद्बहुमूत्रञ्च प्रमेहमविकल्पतः ॥ १६ ॥ सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ और फरहदके रसमें शुद्ध किया हुआ पारा १ भाग और मूषाकानीके रसमें शुद्ध किया हुआ गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर इस कज्जलीमें घीक्वारके रसमें शुद्ध किया हुआ लोहाभस्म ४ भाग तथा अभ्रकभस्म, वंगभस्म, रूपाभस्म, खपरिया, सोनामाखीभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा भाग मिलाकर घृतकुमारीके रसमें खरल करके सात वार भावना देवे । पश्चात् मण्डूकपर्णीके रसमें खरल कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । सोमरोगको दूर करनेके लिये इन गोलियोंको सहतमें मिलाकर सेवन करे । इस औषधिके भक्षण करनेसे बीस प्रकारके प्रमेह, बहुमूत्र, सोमरोग, मूत्रातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, बहुत दोष, बहुत प्रकारका मधुमेह, हस्तिमेह, इक्षुमेह, लाला- मेह और अन्यान्य सब प्रकारके प्रमेहरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहत्सोमनाथ रस कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ सोमेश्वर रस । शालार्जुनं लोध्रकञ्च कदम्बागुरुचन्दनम् । अग्निमन्थं निशायुग्मं धात्रीदाडिमगोक्षुरम् ॥ १७ ॥ जम्बुवीरणमूलञ्च भागमेषां पलार्द्धकम् । रसगन्धकधान्याब्दमेलापत्रं तथाभ्रकम् ॥ १८ ॥ लौहं रसाञ्जनं पाठा विडङ्गं टङ्कजीरकम् । प्रत्येकं पलिकं भागं पलार्द्धं गुग्गुलोरपि ॥ १९ ॥