भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (४२९) घृतेन वटिकां कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम् । गहनानन्दनाथेन रसो यत्नेन निर्मितः ॥ २० ॥ सोमेश्वरो महातेजाः सोमरोगं निहन्त्यलम् । एकजं द्वन्द्वजञ्चैव सन्निपातसमुद्भवम् ॥ २१ ॥ मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं कामलाञ्च हलीमकम् । भगन्दरोपदंशौ च विविधान्पिडिकाव्रणान् । विस्फोटार्बुदकण्डूं च सर्वमेहं विनाशयेत् ॥ २२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे सोमरोगाधिकारः । राल, अर्जुनकी छाल, लोध, कदमकी छाल, अगर, लाल चन्दन, अरणी, हल्दी, दारुहल्दी,आमले, अनारका बक्कल, गोखुरूके बीज, जामुनकी छाल और खस यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । पारा, गन्धक, धनिया, नागरमोथा, इलायची, तेजपात, अभ्रक, लोह- भस्म, रसौंत, पाठ, वायविडंग, सुहागा और जीरा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेवे और गूगल २ तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके घीमें पीसकर सोलह २ रत्तीकी गोली बना लेवे । अत्यंत तेजवाली इस औषधिके सेवन करनेसे एकदोषज, द्विदोपज, त्रिदोषज और सन्निपातज, सोमरोग, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, कामला, हलीमक, भगन्दर, उपदंश, अनेक प्रकारका व्रण और पिडिका, विस्फोटक, अर्बुद, कण्डू और सर्व प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं । इस सोमेश्वर रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ १७–२२ ॥ इति सोमरोगचिकित्सा । १५ ।