भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 456

( ४३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ स्थौल्याधिकार । त्र्यूषणाद्यलोह । त्र्यूषणं विजया चव्यं चित्रकं विडमौद्भिदम् । वागुजी सैन्धवञ्चैव सौवर्चलसमन्वितम् ॥ १ ॥ अयश्चूर्णेन संयुक्तं भक्षयेन्मधुसर्पिषा । स्थौल्यापकर्षणं श्रेष्ठं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ २ ॥ मेहघ्नं कुष्ठशमनं सर्वव्याधिहरं परम् । नाहारे यन्त्रणा कार्या न विहारे तथैव च ॥ त्र्यूषणाद्यमिदं लौहं रसायनवरोत्तमम् ॥ ३ ॥ त्रिकुटा, भांग, चव्य, चित्रककी जड़, विडनमक, औद्भिदलवण, बावचीके बीज, सेंधानमक और कालानमक यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मेदरोग नष्ट होता है । बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रमेह, कुष्ठ और समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार विहार करे ॥ १-३ ॥ वडवाग्निलोह । सूतभस्म सतालञ्च लौहं ताम्रं समं समम् । मर्दयेत्सूर्यपत्रेण चास्य वल्लं प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥ मधुना स्थूलरोगे च शोथे शूले तथैव च । मध्वाज्यमनुपानञ्च देयं वापि कफोल्वणे ॥ ५ ॥ रससिन्दूर, हरितालभस्म, लोहाभस्म और तांबाभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । मेदरोग, शोथ और शूलरोगमें इस औषधिको