रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मेहमुद्गर रस । रसाञ्जनं विडं दारु बिल्वगोक्षुरदाडिमम् । भूनिम्बं पिप्पलीमूलं त्रिकटु त्रिफला त्रिवृत् ॥ १४ ॥ प्रत्येकं तोलकं देयं लौहचूर्णन्तु तत्समम् । पलैकं गुग्गुलुं दत्त्वा घृतेन वटिकां कुरु ॥ १५ ॥ माषैका निर्मिता चेयं मेहमुद्गरसंज्ञिनी । श्रीमद्गहननाथेन लोकनिस्तारकारिणा ॥ १६ ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं छागीदुग्धं जलञ्च वा । मेहांश्च विंशतिं हन्ति मूत्रकृच्छ्रं हलीमकम् ॥ १७ ॥ अश्मरीं कामलां पाण्डुं मूत्राघातमरोचकम् । अर्शांसि व्रणकुष्ठञ्च वातरक्तं भगन्दरम् ॥ १८ ॥ रसौत, विरियासेंचरनमक, दारुहलदी, बेलकी छाल, गोखुरुके बीज, अनारका बक्कल, चिरायता, पीपलामूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल और निसोध यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, गूगल ४ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृतमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । बकरीके दूध अथवा जलके साथ इस औष- धिके सेवन करनेसे बीस प्रकारका प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, हलीमक, अश्मरी, कामला, पाण्डु, मूत्राघात, अरुचि, बवासीर, व्रण, कुष्ठ, वातरक्त और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं । यह मेहमुद्गर रस श्रीमान् गहना- नन्दनाथने कहा है ॥ १४–१८ ॥ मेघनादरस । भस्म सूतं समं कान्तमभ्रकन्तु शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषत्रिफलांकोठजीरकम् ॥ १९ ॥