रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४१७ ) सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । यह बृहत् हरिशंकर रस गहनानन्दने कहा है ॥ ९ ।। १० ॥ आनन्दभैरव रस । वङ्गभस्म मृतं स्वर्णं रसं क्षौद्रैर्विमर्दयेत् । द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं हन्ति मेहं चिरोद्भवम् । गुञ्जामूलं तथा क्षौद्रैरनुपानं प्रशस्यते ॥ ११ ॥ वंगभस्म, सोनाभस्म और रससिन्दूर इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें मिलाकर दो रत्ती परिमाण नित्य खावे । इससे बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह नष्ट होजाता है। इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् गुंजाकी जड़को सहतमें मिलाकर भक्षण करे । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ११ ॥ विद्यावागीश रस । मृतसूताभ्रनागञ्च स्वर्णं तुल्यं प्रकल्पयेत् । महानिम्बस्य चूर्णं तु चतुर्भिः सममाहरेत् ॥ १२ ॥ मधुना लेहयेन्माषं लालामेहप्रशान्तये । सक्षौद्रं रजनीचूर्णं लेह्यं निष्कद्वयं तथा ॥ असाध्यं नाशयेन्मेहं विद्यावागीशको रसः ॥ १३ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, सीसाभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, बकायनका चूर्ण ४ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके एक मासे सहतके साथ सेवन करनेसे लालामेह नष्ट होता है। इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् छः मासे हल्दीके चूर्णको सहतमें मिलाकर चाटे । इसके सेवन करनेसे असाध्य प्रमेहरोग भी नष्ट हो जाता है । इसको विद्यावागीश रस कहते हैं ॥१२॥१३॥