भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 442

( ४१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विशेषान्मेहरोगेषु त्रिफलामधुसंयुक्तम् । युञ्जीत वल्लमेकन्तु रसेन्द्रस्यास्य वैद्यराट् ॥ ७ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर बड़के दूधमें दो प्रहरतक खरल करके मूषामें रखकर मंद मंद अग्निसे पकावें । इस औषधिका सब रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । प्रमेह रोगमें इस औषधिको दो रत्ती लेकर त्रिफलेके रसके साथ और सह- तके साथ सेवन करे । इसको प्रमेहसेतु रस कहते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ विडंगाद्य लोह । विडङ्गत्रिफलामुस्तैः कणया नागरेण च । जीरकाभ्यां युतं हन्ति प्रमेहानतिदारुणान् ॥ लौहं मूत्रविकारांश्च सर्वानैव विनाशयेत् ॥ ८ ॥ वायविडंग, हरड़, बहेड़ा, आमला, नागरमोथा, पीपल, सोंठ, जीरा और कालाजीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे प्रमेह और सब प्रकारके मूत्ररोग नष्ट होते हैं । इसको विडंगाद्य लोह कहते हैं ॥ ८ ॥ बृहत् हरिशंकर रस । रसगन्धकलौहञ्च स्वर्णं वङ्गञ्च माक्षिकम् । समभागं तु संपिष्य वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ९ ॥ सप्ताहमामलद्रावैर्भावितोऽयं रसेश्वरः । हरिशङ्करनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ प्रमेहान् विंशतिं हन्ति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१०॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म और सोना- माखीभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आमलोंके रसमें