रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४१९) कार्पासबीजं रजनीचूर्णं भाव्यञ्च वह्निना । विंशतिधा विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ माषमात्रं हरेन्मेहं मेघनादरसो महान् ॥ २० ॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, अभ्रक, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मैनाशल, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला, अंकोलकी जड़, जीरा, कपासके बीज और हल्दी इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रककी जड़के रसमें बीस वार भावना देवे । इसमेंसे एक मासा परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर चाटनेसे मेहरोग नष्ट होता है । इसको मेघनाद रस कहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ चन्द्रप्रभा वटी । मृतसूताभ्रकं लोहं नागं वङ्गं समं समम् । एलाबीजं लवङ्गञ्च जातीकोषफलं तथा ॥ २१ ॥ मधूकं मधुयष्टिश्च धात्री च समशर्करा । कर्पूरं खादिरं सारं शताह्वा कण्टकारिका ॥ २२ ॥ अम्लवेतसकं तुल्यं दिनैकं लाङ्गलीद्रवैः । भावयेन्मेषदुग्धेन नागवल्लया रसैर्दिनम् ॥ २३ ॥ वटिका बदरास्थ्याभा कार्या चन्द्रप्रभा परा । भक्षयेद्वटिकामेकां सर्वमेहकुलान्तिकाम् ॥ २४ ॥ धात्रीपटोलपत्रं वा कषायं वामृतायुतम् । सक्षौद्रं भक्षयेच्चानु सर्वमेहप्रशान्तये ॥ २५ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, सीसाभस्म, वंगभस्म, इला- यची, लौंग, जावित्री, जायफल, महुवेके फूल, मुलैठी, आमले, मिश्री, कपूर, खैरसार, सौंफ, कटेरी और अमलवेत इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर कलिहारीकी जड़के रसमें एक दिन, भेड़के