रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूधमें एक दिन और पानोंके रसमें एक दिन भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना ले । इन गोलियोंमेंसे नित्य एक गोली सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें आमले और पटोलपत्र तथा गिलोयके क्वाथमें सहत मिलाकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं ॥ २१-२५ ॥ इक्षुमेहपर वंगेश्वर रस । रसभस्मसमायुक्तं वङ्गभस्म प्रकल्पयेत् । अस्य माषद्वयं हन्ति मेहान्क्षौद्रसमन्वितम् ॥ २६ ॥ रससिन्दूर और वंगभस्म इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दो मासे परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके प्रमेहरोग नष्ट होते हैं । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ बृहद्वङ्गेश्वर रस । वंगभस्म रसं गन्धं रौप्यं कर्पूरमभ्रकम् । कर्षं कर्षं मानमेषां सूतांघ्रि हेम मौक्तिकम् ॥ २७ ॥ केशराजरसैर्भाव्यं द्विगुञ्जाफलमानतः । प्रमेहान्विंशतिश्चैव साध्यासाध्यमथापि वा ॥ २८ ॥ मूत्रकृच्छ्रं तथा पाण्डुं धातुस्थञ्च ज्वरं जयेत् । हलीमकं रक्तपित्तं वातपित्तकफोद्भवम् ॥ २९ ॥ ग्रहणीमामदोषञ्च मन्दाग्नित्वमरोचकम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३० ॥ बृहद्वङ्गेश्वरो नाम सोमरोगं निहन्त्यलम् । बहुमूत्रं बहुविधं मूत्रमेहं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ मूत्रातिसारं कृच्छ्रञ्च क्षीणानां पुष्टिवर्द्धनः । ओजस्तेजस्करो नित्यं स्त्रीषु सम्यग्वृषायते ॥ ३२ ॥