भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (४३३) यह प्रत्येक दो दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके नीमके पत्तोंके रसमें इक्कीस २१ बार, एरण्डकी जड़के क्वाथमें २१ बार और भांगरेके रसमें सात भावना देकर बेरकी गुठली बराबर गोली बना लेवे । यह औषधि दिनमें एकबार और रात्रिमें एकबार सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे श्लेष्मोदर-रोग नष्ट होता है । इस औषधिके भक्षण करनेके अन्तमें देवदारु और चित्रककी जड़का चूर्ण समान भाग लेकर पीसकर दूधके साथ सेवन करे । इसपर भेड़के दूध और कुलथीके क्वाथके साथ भात खाये । इसको वैश्वानरी वटी कहते हैं ॥ ५-९ ॥ जलोदरारि रस । पिप्पली मरिचं ताम्रं रजनीचूर्णसंयुतम् । स्नुहीक्षीरैर्दिनं मद्यं तुल्यं जैपालबीजकम् ॥ १० ॥ निष्कं खादेद्विरेकं स्यात्सद्यो हन्ति जलोदरम् । रेचनानाञ्च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम् ॥ दिनान्ते च प्रदातव्यमन्नं वा मुद्गयूषकम् ॥ ११ ॥ पीपल, कालीमिरच, तांबाभस्म और हलदी इन सब औषधि- योंका चूर्ण समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । और फिर उसमें सब औषधिकी बराबर शुद्ध जमालगोटेका चूर्ण मिलाकर एक वार दो मासे परिमाण सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होकर जलोदर रोग नष्ट होता है । विरेचनको रोकनेके लिये इस पर दहीके साथ भात हितकारी है । अतएव इस औष- धिके सेवन करनेपर जब अच्छे प्रकारसे दस्त होजायँ तब संध्याके समय दहीके साथ भात खाय । अथवा मूंगके यूषके साथ भात खाय । इसको जलोदरारि रस कहते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥