भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 584 में से

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( ४३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वह्निरस । सूतस्य गन्धकस्याष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः । प्रत्येकञ्च द्विभागं स्यात्त्रिवृज्जैपालचित्रकम् ॥ १२ ॥ प्रत्येकञ्च त्रिभागञ्च व्योषं दन्तिकजीरकम् । प्रत्येकं सप्तभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् ॥ १३ ॥ जयन्ती स्नुकपयो भृंगवह्निवातारितैलकैः । प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक् पृथक् ॥ १४ ॥ असौ वह्निरसो नाम्ना निष्कमुष्णजलैः पिबेत् । विरेचनं भवेत्तेन तक्रभक्तं ससैन्धवम् ॥१५॥ दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् । सर्वोदरहरः प्रोक्तः श्लेष्मवातहरः परः ॥ १६ ॥ पारा ८ भाग, गंधक ८ भाग, हलदी, हरड़, बहेड़ा, आमला और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग, निसोथकी जड़, जमालगोटे और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि तीन तीन भाग, सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीके बीज और जीरा यह प्रत्येक औषधि सात सात भाग लेवे । सबको एकत्र पीसकर जयंतीके पत्तोंके रस, थूहरके दूध, भांगरेके रस, चित्रककी जड़का रस और एरण्डीके तेलमें अलग अलग सात सात भावना देकर ४ मासे परिमाण औषधि गरम जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विरेचन होगा । दिनके अंतमें तक्र, भात और सेंधानमक मिलाकर पथ्य देवे । इसके सेवन करनेपर शीतल जलको त्याग देवे । इससे सब प्रकारके उदररोग और वातकफोत्पन्न रोग नष्ट होते हैं । इसको वह्निरस कहते हैं १२-१६॥ त्रैलोक्यडुम्बर रस । द्वौ भागौ शिवबीजस्य गन्धकस्य चतुष्टयम् । अभ्रवह्निविडङ्गानां गुडूचीसत्त्वनागयोः ॥१७॥

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