भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (४३६) कृष्णजीरकटूनाञ्च लवणक्षारयोरपि । प्रत्येकं भागमादाय मर्दयेत्सुरसाद्रवैः ॥ १८ ॥ बीजपूररसैर्भूयो मर्दयित्वा विशोषयेत् । त्रैलोक्यडुम्बरो नाम वातोदरकुलान्तकः ॥ १९ ॥ गुञ्जाद्वयं ततश्चास्य ददीत घृतसंयुतम् । भोजयेत्स्निग्धमुष्णञ्च पायसञ्च विवर्जयेत् ॥ २० ॥ पारा २ भाग, गंधक ४ भाग, अभ्रकभस्म, चित्रककी जड़, वाय- विडंग, गिलोयका सत, सीसाभस्म, काला जीरा, सोंठ, मिरच, पीपल, सेंधानमक और जवारखार यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके तुलसीके पत्तोंके रस और बिजौरे नींबूके रसमें मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, घृतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे वातजन्य उदररोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेपर गरम और स्निग्ध पदार्थ भक्षण करे । किन्तु दूधसम्बन्धी किसी प्रकारका कोई पदार्थ नहीं खावे । इसको त्रैलोक्य- डुम्बर रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ महावह्नि रस । चतुः सूतस्य गन्धाष्टौ रजनीत्रिफलाशिलाः । प्रत्येकन्तु त्रिभागं स्याद्दन्तीत्र्यूषणजीरकम् ॥ २१ ॥ प्रत्येकमष्टभागं स्यादेकीकृत्य विचूर्णयेत् । जयन्तीस्नुकूपयोभृङ्गवह्निवातारितैलकैः ॥ २२ ॥ प्रत्येकेन क्रमाद्भाव्यं सप्तवारं पृथक्पृथक् । महावह्निरसो नाम निष्कमुष्णजलैः पिबेत् ॥ २३ ॥ विरेचनं भवेत्तेन तक्रमुष्णं ससैन्धवम् । दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् ॥ सर्वोदरहरः प्रोक्तो मूढवातहरः परः ॥ २४ ॥