रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 458, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा १ तोले, गंधक २ तोले तथा तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, सेंधानमक, विष, काला जीरा, वायविडंग, गिलोयका सत, चित्रककी जड़, वच और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हालूके पत्तोंके रस, चित्रककी जड़के रस और बिजौरे नींबूके रसमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे, इस औषधिको घृतमें मिलाकर चाटनेसे वातोदर रोग नष्ट होता है। चित्रककी जड़का चूर्ण २ पल और जवाखार २ पल, घृत १ प्रस्थ और गोमूत्र ४ प्रस्थ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर यथाविधिसे पकावे । जब केवल घृत बाकी रह जाय तब उतार लेवे । इस औषधिक सेवन करनेके पश्चात् इस घृतको पान करे । इसको त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ १-४ ॥ वैश्वानरी वटी । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मृताकार्य्यःशिलांजतु । रसमानं प्रदातव्यं रसस्य द्विगुणं विषम् ॥ ५ ॥ त्रिकटु चित्रकं वीरा निर्गुण्डी मूसलीरजः । अजमोदा विषांशेन प्रत्येकञ्च नियोजयेत् ॥ ६ ॥ निम्बपञ्चांगुलक्वाथैर्भावनाश्चैकविंशतिः । भृङ्गराजरसैः सप्त दत्त्वा क्षौद्रैर्विलोडयेत् ॥ ७ ॥ भक्षयेद्बदरास्थ्याभां वटिकां तां दिवानिशि । श्लेष्मोदरं निहन्त्याशु नाम्ना वैश्वानरी वटी ॥ ८ ॥ देवदारुवह्निमूलकल्कं क्षीरेण पाययेत् । भोजनं मेषदुग्धेन कुलत्थानां रसेन तु ॥ ९ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, तांबाभस्म, लोहाभस्म और शिला- जीत यह प्रत्येक एक एक भाग, विष २ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, क्षीरकाकोली, सम्हालूके पत्ते, मूसली और अजवायन