भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ४२५ ) एषाञ्च द्विगुणं भागं मर्दयित्वा प्रयत्नतः । भावना तत्र दातव्या धात्रीफलरसेन च ॥ ५४ ॥ मात्रा चणकतुल्या च गुटिकेयं प्रकीर्तिता । प्रमेहं बहुमूत्रञ्च अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रकम् ॥ ५५ ॥ व्रणं हन्ति महाकुष्ठमर्शांसि च भगन्दरम् । योगेश्वरो रसो नाम महादेवेन भाषितः ॥ ५६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे प्रमेहाधिकारः । पारा, गंधक, लोहभस्म, सीसाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तांबाभस्म, वंगभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; छोटी इलायची, तेजपात, नागरमोथा, वायविडंग, नागकेशर, रेणुका, आमले और पीपलामूल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग ले । इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर आमलोंके रसकी सात भावना देकर चनेकी बरा- बर गोली बना ले । इस औषधिके सेवन करनेसे प्रमेह, बहुमूत्र, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, व्रण, महाकुष्ठ, बवासीर और भगन्दर रोग दूर होते हैं । इस योगेश्वर रसको स्वयं महादेवने कहा है ॥ ५२–५६ ॥ इति प्रमेहाधिकार सम्पूर्ण । अथ सोमरोगचिकित्सा । तालकेश्वर रस । तालं सूतं समं गन्धं मृतलौहाभ्रवङ्गकम् । मर्दयेन्मधुना चैव रसोऽयं तालकेश्वरः ॥ १ ॥ माषमात्रं भजेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये । उदुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमानतः ॥ संलेह्यं मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥ २ ॥