रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हरिताल, पारा, गंधक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म और वंगभस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें पीसकर एक मासे परि- माण लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे एक कर्ष परि- माण गूलरका चूर्ण सहतमें मिलाकर खावे। इसके सेवन करनेसे बहुमूत्र रोग दूर होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गगनादि लोह । गगनं त्रिफला लौहं कुटजं कटुकत्रयम् । पारदं गन्धकञ्चैव विषटङ्गणसर्जिकाः ॥ ३ ॥ त्वगेला तेजपत्रञ्च वङ्गं जीरकयुग्मकम् । एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ४ ॥ तदर्द्धं चित्रकं चूर्णं कर्षैकं मधुना लिहेत । अवश्यं विनिहन्त्याशु मूत्रातीसारसोमकम् ॥ ५ ॥ अभ्रकभस्म, हरड़, बहेड़ा, आमले, लोहभस्म, कुड़ेकी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, पारा, गंधक, विष, सुहागा, सज्जी, दालचीनी, इलायची, तेजपात, वंगभस्म, जीरा और काला जीरा इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक भाग, चित्रककी जड़का चूर्ण आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक कर्ष परिमाण सहतमें मिलाकर सेवन करे तो मूत्रातिसार और सोमरोग नष्ट होते हैं । इसको गगनादिलोह कहते हैं ॥ ३–५ ॥ सोमनाथ रस । कर्षं जारितलौहञ्च तदर्द्धं रसगन्धकम् । एलापत्रं निशायुग्मं जम्बुवीरणगोक्षुरम् ॥ ६ ॥ विडङ्गं जीरकं पाठा धात्री दाडिमटंकणम् । चन्दनं गुग्गुलुं लोध्रशालार्जुनरसाञ्जनम् ॥ ७ ॥