रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४२३ ) औषधियोंको एकत्र पीसकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पाक तैयार होजाय तब एक एक तोलेके लड्डू बना लेवे । प्रतिदिन एक मोदक खाय, इससे सब प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं । इसके सेवन करनेसे वाजत, पित्तज, कफज और त्रिदोषज सब प्रकारका सोमरोग शमन होता है । इससे अनेक प्रकारका मूत्रातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, संग्रहणी, पाण्डु, कामला और कुम्भकामला रोग दूर होता है । यह अत्यन्त वीर्य्यको बढ़ानेवाला, बलकारक, हृदयको हितकारी और वीर्य्यको बढ़ानेवाला है । यह कस्तूरीमोदक चरक ऋषि ने कहा है ॥ ३६-४३ ॥ मेहवज्र । भस्मसूतं मृतं कान्तलौहभस्म शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषं त्रिफलाबिल्वजीरकम् ॥४४॥ कपित्थं रजनीचूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत् । त्रिंशद्वारं विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ ४५ ॥ निष्कमात्रं हरेन्मेहान्मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् । महानिम्बस्य बीजञ्च षण्निष्कं पेषितञ्च यत् ॥४६॥ पलं तण्डुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च । एकीकृत्य पिबेच्चानु हन्ति मेहं चिरोत्थितम् ॥४७॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मनशिल, सोंठ, पीपल, काली मिरच हरड़, बहेडा, आमला, बेलकी छाल, जीरा, कैथ और हल्दी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर भांगरेके रसमें तीस भावना देकर चार चार मासेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रमेह और मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें दो तोले बकायनके बीजोंको चार तोले चावलोंके जलमें पीसकर एक तोला घृत मिलाकर सेवन करे, इससे बहुत दिनोंका प्रमेह रोग दूर होता है ॥ ४४-४७ ॥