रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
३. तृतीय अध्याय: गुल्म, पाण्डु, कामला, राजयक्ष्मा, कास-श्वास एवं वातरोग चिकित्सा
भाषाटीकासहित । ( २६५ ) पञ्चानन वटी । शुद्धसूतं तथा गन्धं मृतताम्राभ्रगुग्गुलु । जैपालबीजं तुल्यांशं घृतेन वटकीकृतम् ॥ ३ ॥ भक्षयेद्वदरास्थ्याभं शोथपाण्डुप्रशान्तये । पञ्चाननवटी ख्याता पाण्डुरोगकुलान्तिका ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, तांबेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, गूगल और जमालगोटे इन सबको एकत्र करके घृतमें पीसकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे शोथ और पांडु रोग नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ प्राणवल्लभ रस । हिंगुलसम्भवं सूतं काश्मीरोद्भवगन्धके । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् ॥ ५ ॥ स्नुहीक्षीरं यवक्षारं जैपालं दन्तिकं त्रिवृत् । प्रत्येकं शाणभागन्तु छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ ६ ॥ चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुना सह । प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ ७ ॥ श्लेष्मदोषं समालोक्य युक्त्या च त्रुटिवर्द्धनम् । निहन्ति कामलां पाण्डुमानाहं श्लीपदं तथा ॥ ८ ॥ गलगण्डं गण्डमालां व्रणानि च हलीमकम् । शोथं शूलमुरुस्तम्भं संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ ९ ॥ वान्तिं मूर्च्छां भ्रमिं दाहं कासं श्वासं गलग्रहम् । असाध्यं सन्निपातञ्च जीर्णज्वरमरोचकम् ॥ १० ॥
( २६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातरक्तं तथा शोषं कण्डूं विस्फोटकापचीम् । नातः परतरं किञ्चित्कामलार्त्तिरुजापहम् ॥११॥ सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, केशर, लोहभस्म, ताम्र- भस्म, कौड़ीकी भस्म, तुत्थ, हींग, हरड, बहेडा, आमला, थूहरका दूध, जवारखार, जमालगोटे, दंतीकी जड और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार २ रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे थोडा जलपान करे । जो कफकी अधिकता हो तो एक एक गोली बढ़ाकर खाये । इस औषधिसे कामला, पांडु, आ- नाह, श्लीपद, गलगण्ड, गण्डमाला, व्रण, हलीमक, शोथ, शूल, ऊरुस्तम्भ, संग्रहग्रहणी, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, दाह, खांसी, श्वास, गलग्रह, असाध्य सन्निपात, जीर्णज्वर, वातरक्त, शोष, कण्डू, विस्फो- टक और अपची यह समस्त रोग नष्ट होते हैं । कामला रोगको हरनेके लिये इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इसको प्राण- वल्लभ रस कहते हैं ॥ ५-११ ॥ कामेश्वर रस । पलं सूतं पलं गन्धं पथ्याचित्रकयोः पलम् । मुस्तैलापत्रकाणाञ्च प्रतिसार्द्धं पलं क्षिपेत् ॥१२॥ त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं विषञ्चापि पलं न्यसेत् । नागकेशरकं कर्षमेरण्डस्य पलं तथा ॥ १३ ॥ पुरातनगुडेनैव तुल्येनैव विमिश्रयेत् । मर्दयेत्कनकद्रावैर्भावयेच्च घृतान्विताम् ॥१४॥ वटिकां बदरास्थ्याभां कारयेद्भक्षयेन्निशि । पाण्डुरोगहरः सोऽयं रसः कामेश्वरःस्वयम् ॥ १५ ॥ पारा १ पल, गंधक १ पल, हरड १ पल, चित्रककी जड १ पल, नागरमोथा, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि डेढ़ डेढ़ पल,
भाषाटीकासहित । ( २६७ ) सोंठ, मिरच, पीपलामूल और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, नागकेशर १ कर्ष और एरण्डके बीज एक पल लेवे, सबको एकत्र पीस लेवे और सबके बराबर पुराना गुड़ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर धतूरेके रसमें भावना देकर घीके योगसे बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना नित्यप्रति रात्रिके समय एक गोली खाये । यह गोली पांडुरोगको नष्ट करती है । इसको कामेश्वर रस कहते हैं ॥ १२–१५ ॥ त्रिकत्रयाद्य लोह । पलं लौहस्य किट्टस्य पलं गव्यस्य सर्पिषः । सितायाश्च पलञ्चैकं क्षौद्रस्यापि पलं तथा ॥ १६ ॥ तोलैकं कान्तलौहस्य त्रिकत्रयसुभावितम् । ततः पात्रे विधातव्यं लोहे च मृन्मये तथा ॥ १७ ॥ हविषा भावितञ्चापि रौद्रे च शिशिरे तथा । भोजनादौ तथा मध्ये चान्ते चापि प्रदापयेत् ॥१८॥ अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् । कामलां पाण्डुरोगञ्च हलीमकं सुदारुणम् ॥ निहन्ति नाऽत्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा॥१९॥ मण्डूर १ पल, गायका घी १ पल, मिश्री १ पल, शहद १ पल और कांतलोहेकी भस्म १ तोला परिमाण लेवे । प्रथम लोहे और मण्डूरको एकत्र पीसकर; घी मिलाकर त्रिकत्रय ( हरड़, बहेड़ा, आमला; सोंठ,मरिच,पीपल, दालचीनी,इलायची और नागकेशर ) के क्वाथमें सात और घृतमें सात लोहेके अथवा मिट्टीके पात्रमें भावना देवे । सूर्योदयके समय क्वाथकी और रात्रिमें सरदीके समय घृतसे भावना देवे;जब भावना समाप्त हो जायें तब मिश्री और शहद मिलावे । दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसका भोज-
( २६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नसे पहिले, भोजनके मध्यमें और भोजनके अन्तमें सेवन करावे । जिस प्रकार सूर्योदयके होनेसे अन्धकारका समूह नष्ट होजाता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे कामला, पाण्डु और हलीमक रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य लोह कहते हैं ॥ १६-१९ ॥ विडंगादि लोह । विडंग-मुस्त-त्रिफला-देवदारु-षडूषणैः । तुल्यमात्रमयश्चूर्णं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ २० ॥ तैरक्षमात्रां गुटिकां कृत्वा खादेद्दिनेदिने । कामलापांडुरोगार्त्तः सुखमापद्यतेऽचिरात् ॥ २१ ॥ वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु और षडूषण ( पीपल पीपलामूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, और मरिच ) यह प्रत्येक औषधि समान भाग और सबकी बराबर लोहाभस्म लेवे और लोहेसे अठगुना गोमूत्र लेवे। प्रथम लोहेके चूर्णको और गोमूत्रको एकत्र मिलाकर एक हांडीमें रखकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गोमूत्र जल जाय केवल लोहा बाकी रहजाय तब उतारकर उपरोक्त विडंगादि चूर्ण मिलाकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली खानेसे कामला और पाण्डुरोग नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है । इसको विडंगादि लोह कहते हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ विडंगत्रिफलाव्योषं शुद्धलोहन्तु तत्समम् । पुरातनगुडेनात्र लेहयेद्दिनसप्तकम् ॥ श्वयथुं नाशयेच्छीघ्रं पाण्डुरोगहलीमकम् ॥ २२ ॥ अन्य विडंगादि लोह-वायविडंग, त्रिफला और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पुराने गुड़में मिलाकर सात दिन खानेसे शोथ, पाण्डुरोग और हलीमक रोग नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥
भाषाटीकासहित । (२६९) त्रैलोक्यसुन्दर रस । मानश्चैकं चतुःसूतं षडभ्रं वसुलौहकम् । गन्धकं त्रिफलाव्योषं चूर्णं मोचरसस्य च ॥ २३ ॥ मुसली चामृतासत्त्वं प्रत्येकं पञ्चभागिकम् । भावयेत्सर्वमेकत्र त्रिफलानां कषायके ॥ २४ ॥ भावना विंशतिर्देया दशरात्रं सुभावना । शिग्रुचित्रकमूलाभ्यामष्टधा च पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरो नाम रसो निष्कमितो हितः । सितया च समं क्षौद्रैः शोथपाण्डुक्षयापहः ॥ ज्वरातिसारसंयुक्तसर्वोपद्रवनाशनः ॥ २६ ॥ मानकन्द १ भाग, पारा ४ भाग, अभ्रक भस्म ६ भाग, लोहेकी भस्म ८ भाग, गंधक, त्रिफला, त्रिकुटा, मोचरस, मुसली और गिलो- यका सत्त्व यह प्रत्येक पांच पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर दश दिनतक त्रिफलेके क्वाथकी बीस भावना देवे । पश्चात् सहंजिनेके रसमें आठ भावना देवे और चित्रककी जड़के रसमें आठ भावना देवे । इसमेंसे नित्य चार मासे औषधि मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सूजन, पांडु, क्षयरोग और सर्वोपद्रवसंयुक्त ज्वरातिसार नष्ट होते हैं । इसको त्रैलोक्यसुन्दररस कहते हैं ॥ २३-२६॥ दार्वादि लोह । दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गान्ययसो रजः । मधुसर्पिर्युतं लिह्यात्कामलापाण्डुरोगवान् ॥ २७ ॥ दारुहल्दीकी छाल, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्मका चूर्ण १०
( २७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेवे । सबको एकत्र पीसकर घृत और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे कामला और पांडुरोग नष्ट होते हैं ॥ २७ ॥ पांडुरोगपर पथ्यापथ्य । शालियष्टिकगोधूमयवमुद्गादयो हिताः । रसाश्च जांगलभवा मधुराः पाण्डुरोगिणाम् ॥ २८ ॥ शालिधान, साँठीधान, गेहूं, जौ और मूंग आदि अन्न, जांगलप्रदे- शके जीवोंके मांंसरस और मधुर रसवाले पदार्थ यह सब पांडुरोगि- योंको हितकारी हैं ॥ २८ ॥ अथ कामलाचिकित्सा । पाण्डुरोगोदिता योगा घ्नन्ति ते कामलामपि ॥२९॥ जो प्रयोग पांडुरोगमें कहे हैं वह सब कामलारोगको भी नष्ट करते हैं ॥ २९ ॥ चन्द्रसूर्यात्मक रस । सूतकं गन्धकं लौहमभ्रकञ्च फलं पलम् । शंखटंकवराटं च प्रत्येकार्द्धपलं हरेत् ॥ ३० ॥ गोक्षुरबीजचूर्णञ्च पलैकं तत्र दीयते । सर्वमेकीकृतं चूर्णं बाष्पयन्त्रे विभावयेत् ॥ ३१ ॥ पटोलपर्पटौ भार्ङ्गी विदारीशतपुष्पिका । दन्ती वासा कुण्डली च काकमाचीन्द्रवारुणी ॥३२॥ वर्षाभूकेशराजञ्च शालिश्च द्रोणपुष्पिका । प्रत्येकार्द्धपलैर्द्रवैर्भावयित्वा वटीं कुरु ॥ ३३ ॥ चतुर्दशवटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः । गहनानन्दनाथोक्तश्चन्द्रसूर्यात्मको रसः ॥ ३४ ॥
भाषाटीकासहित । (२७१) हलीमकं निहन्त्याशु पाण्डुरोगं सकामलाम् । जीर्णज्वरं सविषममम्लपित्तमरोचकम् ॥ ३५ ॥ शूलं प्लीहोदरानाहमष्ठीलां गुल्मविद्रधिम् । शोथं मन्दानलं हिक्कां कासं श्वासं वमिं भ्रमम्॥३६॥ भगन्दरोपदंशं च दद्रुकण्डूव्रणानि च । दाहं तृष्णामुरुस्तम्भमामवातं कटीग्रहम् ॥ ३७ ॥ युक्तो मण्डेन मद्येन मुद्गयूषेण वारिणा । गुडूचीत्रिफलावासाक्वाथनीरेण वाक्वचित् ॥ ३८ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रक भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, शंखकी भस्म, सुहागा और कौड़ीकी भस्म प्रत्येक आधा आधा पल, गोखुरुके बीज १ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके पटोलपात, पित्तपापड़ा, भारंगी, विदारीकंद, सौंफ, गिलोय, दंतीकी जड़, अडूसा,मकोय, इन्द्रायनकी जड़, पुनर्नवा, कुकुरभांगरा, शालिंच शाक, द्रोणपुष्पी ( गूमा ) इन प्रत्येक औषधिके आधे आधे पल स्वरसमें भावना देकर गोली बना लेवे, बकरीके दूधके साथ इन चौदह गोलियोंको चौदह दिनतक सेवन करे। इससे हलीमक, पांडुरोग, कामला, जीर्णज्वर, रक्तपित्त, अम्लपित्त, अरुचि, शूल, प्लीहा, उदर- रोग, आनाह, आष्ठीला, गुल्म, विद्रधि, शोथ, मंदाग्नि, हिक्का, खांसी, श्वास, वमन, भ्रम, भगन्दर, उपदंश, दद्रु, कण्डू, व्रण, दाह, तृषा, ऊरुस्तम्भ, आमवात और कमरकी पीड़ा यह सब शांत होते हैं। मांड, मदिरा, मूंगकका यूष,जल,गिलोयका क्वाथ,त्रिफलेका क्वाथ और अडूसेका क्वाथ इनमेंसे एक किसीके साथ इसका सेवन करे । इसको गहनानन्दनाथने चन्द्रसूर्यात्मक रस कहा है ॥ ३०-३८ ॥
( २७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पाण्डुसूदन रस । रसं गन्धं मृतं ताम्रं जयपालञ्च गुग्गुलु । समांशमाज्यसंयुक्तां गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ३९ ॥ एकैकां भक्षयेन्नित्यं पाण्डुशोथप्रशान्तये । शीतलञ्च जलञ्चाम्लं वर्जयेत्पाण्डुसूदने ॥ ४० ॥ पारा, गंधक, तांबा भस्म, जमालगोटेके बीज और गूगल यह सब औषधि समान भाग लेकर घृतमें मर्दन करके यथोक्त मात्राकी गोली बना लेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली पाण्डु और शोथरोग शान्त करनेके लिये खावे । इसके सेवन करनेपर शीतल जल और अम्लरसवाले पदार्थोंको त्याग देवे । इसको पाण्डुसूदन रस कहते हैं ॥ ३९ ॥ ४० ॥ मण्डूरवज्र वटक । पञ्चकोलं समरिचं देवदारुफलत्रिकम् । विडंगमुस्तयुक्ताश्च भागास्त्रिपलसम्मिताः ॥ ४१ ॥ यावन्त्येतानि चूर्णानि मण्डूरं द्विगुणं ततः । पक्त्वा चाष्टगुणे मूत्रे घनीभूते तदुद्धरेत् ॥ ४२ ॥ ततोऽक्षमात्रान् वटकान्पिबेत्तक्रेण तक्रभुक् । पाण्डुरोगं जयत्याशु मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥४३ ॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषमूरुस्तम्भमथापि वा । क्रिमिं प्लीहानमानाहं गलरोगञ्च नाशयेत् । मण्डूरवज्रनामायं रोगानीकप्रणाशनः ॥ ४४ ॥ पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड़, सोंठ, मरिच, देवदारु, हरड़, बहेड़ा, आमला, वायविडंग और नागरमोथा यह प्रत्येक औषधि तीन तीन पल और सब औषधिसे दुगुना मण्डूर लेवे, और मण्डूरस आठगुना गोमूत्र लेवे । प्रथम मण्डूर और गोमूत्रको एकत्र करके '
भाषाटीकासहित । (२७३) पकावे । जब पकते पकते गाढा हो जाये तब उसमें उपरोक्त पंच- कोलका चूर्ण डालकर एक एक तोलेकी वटी बना लेवे । एक एक वटी तक्रके साथ सेवन करनेसे पांडुरोग, मंदाग्नि, अरुचि, बवासीर, संग्- हणी, ऊरुस्तम्भ, कृमि, प्लीहा, आनाह और गलरोग नष्ट होते हैं । इसको मण्डूरवज्र वटक कहते हैं ॥ ४१-४४ ॥ लघ्वानन्द रस । पारदं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्गणञ्च चतुर्गुणम् ॥ ४५ ॥ भृङ्गराजरसैः सप्त भावना चाम्लवेतसैः । गुञ्जाद्वयं पर्णखण्डे खादेत्सायं निहन्ति च ॥ ४६ ॥ पाण्डुतामरुचिश्चैव मन्दाग्निं ग्रहणीं ज्वरम् । वातश्लेष्मभवान् रोगाञ्जयेदचिरसेवनात् ॥ ४७ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, विष और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, काली मिरच आठ भाग, सुहागा चार भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके भांगरेके रसकी सात भावना और खट्टे अनारके बीजोंके रसकी सात भावना देकर दो २ रत्तीकी गोली बना कर पानके साथ सेवन करनेसे पाण्डुरोग, अरुचि, मन्दाग्नि, ग्रहणी, ज्वर, वातकफके विकार थोड़े ही समय सेवन करनेसे नष्ट होते हैं। इस- को लघ्वानन्द रस कहते हैं ॥ ४५-४७ ॥ सम्मोह लोह । त्रिकटुत्रिफलावह्निविडङ्गं लौहमभ्रकम् । एतानि समभागानि घृतेन वटिकां कुरु ॥ ४८ ॥ कामलां पाण्डुरोगञ्च हृद्रोगं शोथमेव च । भगन्दरं क्रिमिकोष्ठं मन्दानलमरोचकम् ॥ ४९ ॥
( २७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तान्सर्वानाशयेदाशु बलवर्णाभिवर्द्धनः । सम्मोहलोहनामायं पाण्डुरोगे च पूजितः ॥ ५० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, चित्रक, वायविडङ्ग, लोहभस्म, अभ्रकभस्म यह सब समान भाग लेकर घृतमें गोलियां बनावे । यह रस सेवन करनेसे कामला, पाण्डुरोग, हृद्रोग, शोथ, भगन्दर, कोष्ठगतक्रिमि, मन्दाग्नि, अरुचि इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है और बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाला है; पाण्डुरोगके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है । इसको सम्मोह लोह कहते हैं ॥ ४८-५० ॥ त्र्यूषणादि मण्डूर । स्विन्नमष्टगुणे मूत्रे लौहकिट्टं सुशोधितम् । पाकान्ते त्र्यूषणं वह्निवरादार्वीसुरद्रुमान् ॥ ५१ ॥ विडंगबीजचूर्णञ्च मुस्तं किट्टसमं क्षिपेत् । प्रातःकर्षं भजेदस्य जीर्णे तक्रौदनं भजेत् ॥ ५२ ॥ हलीमकं पाण्डुरोगमर्शांसि श्वयथुं तथा । ऊरुस्तम्भं जयेदेतत्कामलां कुम्भकामलाम् ॥५३॥ शुद्ध मण्डूरको आठ गुणे गोमूत्रमें पकाकर गाढ़ा करके त्रिकुटा, चित्रकमूल, त्रिफला, दारुहल्दी, देवदारु, वायविडंग, नागरमोथा यह सब मण्डूरके बराबर लेकर (कूटकपड़छानकर) मिलावे । इसमेंसे १ तोला परिमाण प्रातःकाल सेवन करे । औषधिके पचजानेपर भात और माठा खाना चाहिये । इससे हलीमक, पाण्डुरोग, बवासीर, शोथ, ऊरुस्तम्भ, कामला और कुम्भकामला यह सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ५१-५३ ॥
भाषाटीकासहित । ( २७५ ) त्रिफलाया गुडूच्या वा दार्व्या निम्बस्य वा रसः । प्रातर्माक्षिकसंयुक्तः शीलितः कामलापहः ॥ ५४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे पाण्डुरोगाधिकारः । त्रिफला, गिलोय, दारुहल्दी और नीम इनके रसमें सहत डालकर सेवन करनेसे कामलारोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥ इति पाण्डुरोगचिकित्सा । अथ रक्तपित्तचिकित्सा । अर्केश्वर रस । मृतार्कं सूतवंगञ्च मृताभ्रञ्च समाक्षिकम् । अमृतास्वरसैर्भाव्यं त्रिसप्तकपुटे पचेत् ॥ १ ॥ वासा क्षीरविदारीभ्यां चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः । भक्षणाद्विनिहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ २ ॥ तांबा भस्म, पारद भस्म, वंग भस्म, अभ्रक भस्म और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर गिलोयके रसमें २१ वार भावना देकर पुटपाककी विधिसे पकाकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको अडूसा और विदारीकन्दके रसके साथ सेवन करनेसे दारुण रक्तपित्तरोग दूर होता है । इसको अर्केश्वर रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ सुधानिधि रस ! सूतं गन्धं माक्षिकञ्चैव लौहं सर्वं घृष्ट्वा त्रैफलेनोद- केन । लौहे पात्रे गोमयेऽग्नौ पुटित्वा रात्रौ दद्याद् रक्तपित्तप्रशान्त्यै ॥ ३ ॥
( २७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गन्धक, सोनामाखीकी भस्म और लोहा भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथमें लोहेके पात्रमें अरने उप- लोंकी अग्निके द्वारा पकावे । रात्रिके समय इस औषधिके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ आमलक्यादि लोह । आमला पिप्पलीलोहं तुल्यया सितया सह । रक्तपित्तहरं लौहं योगराजमिदं स्मृतम् ॥ ४ ॥ वृष्याग्निदीपनं बल्यमम्लपित्तविनाशनम् । पित्तोत्थानपि वातोत्थान्निहन्ति विविधान्गदान् ॥५॥ आमले, पीमल, लोहेका चूर्ण समानभाग और सबकी बराबर मिश्री मिलावे । सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे रक्तपित्त रोग नष्ट होता है । इसको योगराज कहते हैं, इससे बलकी वृद्धि होती है और अग्नि दीप्त होती है । इससे अम्लपित्त प्रभृति वातिक, पैत्तिक और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं, इसको आमलक्यादि लोह कहते हैं ॥४॥५॥ शतमूल्यादि लोह । शतमूलीसिताधान्यानागकेशरचन्दनैः । त्रिकत्रयतिलैर्युक्तं लौहं सर्वगदापहम् ॥ तृष्णादाहज्वरच्छर्दिरक्तपित्तविनाशनम् ॥ ६ ॥ शतावर, मिश्री, धनिया, नागकेशर, चन्दन, त्रिकुटा, त्रिफला, त्रिजात और तिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बनाकर सेवन करनेसे तृषा, दाह, ज्वर, वमन और रक्तपित्त प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥
भाषाटीकासहित । ( २७७ ) रक्तपित्ते पिबेद्व्योमसहितं पर्पटीरसम् । वासाद्राक्षाभयानाञ्च क्वाथं वा शर्करान्वितम् ॥ योगवाहिरसान्सर्वान् रक्तपित्ते प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ रक्तपित्तरोगमें पित्तपापड़ेके रसके साथ अभ्रककी भस्मको; अथवा अडूसा, दाख और हरड़ इनके क्वाथमें मिश्री डालकर पीवे; अथवा समस्त योगवाही औषधि प्रयुक्त करे ॥ ७ ॥ रक्तपित्तान्तक रस । मृताभ्रं मुण्डतीक्ष्णञ्च माक्षिकं रसतालकम् । गन्धकञ्च भवेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृताद्रवैः ॥ ८ ॥ दिनैकं मर्दयेत्खल्ले सिताक्षौद्रसमन्वितम् । माषमात्रं निहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ज्वरं दाहं क्षतक्षीणं तृष्णां शोषमरोचकम् ॥ ९ ॥ अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, सोनामाखीभस्म, पारा- भस्म, हरितालभस्म और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर मुलहठी, दाख और गिलोय इनके क्वाथमें अलग अलग एक एक दिन पर्यंत खरल करे । इस औषधिको एक मासे परिमाण मिश्री और शहदमें मिलाकर खानेसे शीघ्र ही दारुण रक्तपित्त, ज्वर, दाह, क्षतक्षीण, तृषा, शोष और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इसको रक्त- पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ८ ॥ ९ ॥ रसामृत रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं माक्षिकञ्च शिलाजतु । गुडूची चन्दनं द्राक्षा मधुपुष्पञ्च धान्यकम् ॥ १० ॥ कुटजस्य त्वचं बीजं धातकी निम्बपत्रकम् । यष्टीमधुसमायुक्तं मधुशर्करयाऽन्वितम् ॥ ११ ॥
( २७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधिना मर्दयित्वा तु कर्षमात्रं तु भक्षयेत् । धारोष्णपयसा युक्तं प्रातरेव समुत्थितः ॥ १२ ॥ पित्तं तथाऽम्लपित्तञ्च रक्तपित्तं विशेषतः । निहन्ति सर्वदोषं च ज्वरं सर्वं न संशयः ॥ रसामृतरसो नाम गहनानन्दभाषितः ॥ १३ ॥ पारा १ भाग, गंधक, सोनामाखी भस्म, शिलाजीत, लालचन्दन, गिलोय, दाख, महुवेके फूल, धनिया, इन्द्रजौ, कुड़ेकी छाल, धायके फूल, नीमके पत्ते, मुलैठी, शहद और मिश्री यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग लेवे, इन सबको विधिवत् एकत्र खरल करके प्रातःकाल मुख धोकर एक कर्ष परिमाण भक्षण करे और ऊपरसे धारोष्ण दूध पीवे । इसके सेवन करनेसे पित्तरोग, अम्लपित्त, रक्तपित्त और ज्वर निश्चय नष्ट होते हैं। इसको स्वयं गहनानन्दनाथने कहा है । इसको रसामृत रस कहते हैं ॥ १०-१३ ॥ खण्डकूष्माण्ड । कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् । पचेत्तते घृतप्रस्थे शनैस्ताम्रमये दृढे ॥ १४ ॥ यदा मधुनिभः पाकस्तदा खण्डं शतं न्यसेत् । पिप्पलीशृङ्गवेराभ्यां द्वे पले जीरकस्य च ॥ १५ ॥ त्वगेलापत्रमरिचधान्यकानां पलार्द्धकम् । न्यसेच्चूर्णीकृतं तत्र दर्व्या संघट्टयेत्पुनः ॥ १६ ॥ तत्पक्वं स्थापयेद्भाण्डे दत्त्वा क्षौद्रं घृतार्द्धकम् । तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तपित्तक्षतक्षयी ॥ १७ ॥ उत्तम प्रकारसे पका हुआ एक पेठा लेकर उसको छीलकर उसके बीज निकाल डाले । इसको अच्छे कली किये हुए पात्रमें पकाकर निचोड़ लेवे और छिलके रहित पेठेके टुकड़े १०० पल लेवे । फिर
भाषाटीकासहित । ( २७९ ) इसको उत्तम कली किये हुए तांबेके पात्रमें डालकर एक प्रस्थ घृतमें पकावे। जब पकते पकते शहदके समानवर्ण होजाय तब १०० पल खांडकी चासनी उसी पेठेमेंसे निकले हुए जलसे बनाकर डाले तथा पीपल, अदरख और जीरा इन प्रत्येकका चूर्ण आठ आठ तोले; दाल- चीनी, इलायची, तेजपात, कालीमिरच और धनिया प्रत्येकका चूर्ण दो दो तोले, सबको मिलाकर अच्छे प्रकारसे करछीसे चलाकर एक- जीव करके रख देवे। फिर घृतसे आधा भाग शहद डालकर एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसका अग्निके बलानुसार रक्तपित्त, क्षत और क्षयरोगी सेवन करे ॥ १४-१७ ॥ शर्कराद्य लोह । शर्करातिलसंयुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः। रक्तपित्तं निहन्त्याशु चाम्लपित्तहरं परम् ॥ १८ ॥ मिश्री, तिलका चूर्ण, हरड़का चूर्ण, बहेड़ेका चूर्ण, आमलोंका चूर्ण, सोंठका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, चित्रकका चूर्ण, नागरमोथेका चूर्ण और वायविडंगका चूर्ण यह प्रत्येक एक एक भाग और सब चूर्णकी बराबर लोहाभस्म लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे रक्तपित्त और अम्लपित्त रोग नष्ट होते हैं। इसको शर्कराद्य लोह कहते हैं ॥ १८ ॥ समशर्कर लोह । लोहाच्चतुर्गुणं क्षीरमाज्यं द्विगुणमुत्तमम् । चूर्णं पादन्तु वैडङ्गं दद्यान्मधुसिते समे ॥ १९ ॥ ताम्रपात्रे दृढे पक्त्वा स्थापयेद् घृतभाजने । माषकादिक्रमेणैव भक्षयेद्विधिपूर्वकम् ॥ २० ॥ अनुपानं प्रयुञ्जीत नारिकेलोदकादिकम् । रक्तपित्तं जयेत्तीव्रमम्लपित्तं क्षतक्षयम् । प्रकृष्टकान्तिजननमायुष्यमुत्तमोत्तमम् ॥ २१ ॥
( २८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहभस्म १ भाग, दूध, ४ भाग, घृत २ भाग, वायविडंगका चूर्ण चौथाई भाग, मिश्री एक भाग और सहत १ भाग लेवे । प्रथम लोह भस्म, दूध और घृत इनको एकत्र करके एक दृढ तांबेके पात्रमें मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गाढ़ा होजाय तब वायविडंगका चूर्ण और मिश्री डाल देवे । पाक सिद्ध होनेपर चूल्हे परसे उतार लेवे । शीतल होनेपर शहद मिलाकर एक घीके चिकने बासनमें भर- कर रख देवे । इस औषधिको पहिले दिन एक मासा, दूसरे दिन दो मासे और तीसरे दिन तीन मासे इस प्रकार प्रतिदिन छः दिन तक एक एक मासा बढ़ाकर खाये। इसके सेवन करनेके पश्चात् नारियलका जल पान करे । इससे रक्तपित्त, अम्लपित्त, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं । यह आनन्दजनक कांतिको उत्पन्न करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है । इसको समशर्कर लोह कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ कपर्दक रस । मृतं वा मूर्च्छितं सूतं कार्पासकुसुमद्रवैः । मर्दयेद्दिनमेकन्तु तेन पूर्या वराटिका ॥ २२ ॥ निरुध्य चान्धमूषायां भाण्डे रुद्धा पुटे पचेत् । उद्धृत्य चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं मरिचैर्द्विगुणैः सह ॥ २३ ॥ गुञ्जामात्रां घृतेनैव भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । उदुम्बरं घृतञ्चैव अनुपानं प्रयोजयेत् ॥ कपर्दको रसो नाम रक्तपित्तविनाशनः ॥ २४ ॥ पारेकी भस्मको अथवा मूर्च्छित पारेको लेकर कपासके फूलोंके रसमें एक दिनतक खरल करके कौड़ियोंमें भरकर उसका मुख बंद कर देवे । फिर उन कौड़ियोंको अन्धमूषामें रखकर पुटपाक करे; शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो भाग काली मिरचोंका चूर्ण मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंका घृतके
भाषाटीकासहित । (२८१) साथ सेवन करे और ऊपरसे गूलर और घीका अनुपान करे । इसके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २३-२४ ॥ नीलोत्पलसिताक्षौद्रसंयुक्तं पद्मकेसरम् । तण्डुलोदकपानेन रक्तपित्तं नियच्छति ॥ २५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे रक्तपित्तचिकित्सा । नीलकमल अथवा नीलोत्पल ( नीलोफर ), मिश्री, शहद और कमलकेशर यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके चावलोंके जलके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ २५ ॥ इति रक्तपित्तचिकित्सा । अथ यक्ष्माधिकार । रास्नादि लौह । रास्नाश्वगन्धाकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहं यक्ष्मान्तकृन्मतम् ॥ १ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् । हन्ति कासं स्वराघातं राजयक्ष्म क्षतक्षयम् ॥ बलवर्णाग्निपुष्टीनां वर्द्धनं दोषनाशनम् ॥ २ ॥ रास्ना, असगंध, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, हरड़, बहेडा, आमला, सोंठ, मरिच, पीपल, चित्रक, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे समस्त उपद्रव युक्त, वैद्य करके छोडा हुआ राजयक्ष्म- रोगी अवश्य आरोग्य होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी, स्वरभेद, राजयक्ष्मा, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं; बल, वर्ण अग्नि और पुष्टिकी वृद्धि होती है तथा त्रिदोषको नष्ट करता है । इसको रास्नादि लौह कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
( २८३ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । राजमृगांक रस । रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् । मृततारस्य भागैकं शिलागन्धकतालकम् ॥ ३ ॥ प्रतिभागद्वयं शुद्धमेकीकृत्य विचूर्णयेत् । वराटिका तेन पूर्या चाजाक्षीरेण टङ्कणम् ॥ ४ ॥ पिष्ट्वा तेन मुखं रुद्ध्वा मृद्भाण्डे तां निरोधयेत् । शुष्कं गजपुटे पाच्यं चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् ॥ ५ ॥ दशपिप्पलिकैः क्षौद्रैर्मरिचैर्वा घृतान्वितैः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य क्षयरोगप्रशान्तये ॥ ६ ॥ सघृतैर्दापयेद्वाथ वातश्लेष्मभवे क्षये । रसो राजमृगाङ्कोऽयं नानारोगनिषूदनः ॥ ७ ॥ पाराभस्म, या रससिन्दूर ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, चांदीकी भस्म १ भाग, मैनशिल २ भाग, गंधक २ भाग और हरितालभस्म २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कौडीमें भर देवे । पश्चात् बकरीके दूधमें सुहागेको पीसकर उससे कौडीके मुखको बंद कर देवे, फिर उस कौडीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होने- पर चूर्ण करके दश पीपल और सहतके द्वारा अथवा १० कालीमिरच और घृतके द्वारा इसको चार रत्ती परिमाण क्षयरोगको नष्ट करनेके लिये सेवन करे । वातश्लेष्मज क्षयरोगमें घृतके साथ भक्षण करे । इससे अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥ मृगाङ्क रस । स्याद्रसेन समं हेम·मौक्तिकं द्विगुणं भवेत् । गन्धकञ्च समं तेन रसतुल्यन्तु टंकणम् ॥ तत्सर्वं गोलकं कृत्वा काञ्जिकेन च पेषयेत् । भाण्डे लवणपूर्णेऽथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ८ ॥
भाषाटीकासहित । ( २८३ ) मृगाङ्कसंज्ञको ज्ञेयो राजयक्ष्मनिकृन्तनः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य मरिचैः सह भक्षयेत् ॥ ९ ॥ पिप्पलीदशकैर्वापि मधुना सह लेहयेत् । पथ्यन्तु लघुभिर्मांसैः प्रयोगेऽस्मिन्प्रयोजयेत् ॥१०॥ व्यञ्जनैर्घृतपक्वैश्च संस्कृतैर्ह्यविदाहिभिः ॥ वृन्ताकबिल्वतैलानि कारवेल्लं च वर्जयेत् ॥ स्त्रियं परिहरेद्दूरं कोपञ्चापि विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ पारा १ भाग, सोनाभस्म १ भाग, मोती २ भाग, गंधक ३ भाग और सुहागा १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र कांजीमें पीसकर गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर नमकसे भरी हुई हाँडीमें उस मूषाको रखकर चार प्रहर तक पकावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर काली मिरचोंके चूर्णके साथ; अथवा दश पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेव- नके अंतमें लघु ( हलके ) मांसको घृतके द्वारा संस्कार किये हुए और परिपक्व हुए व्यञ्जन और अविदाही पदार्थ पथ्य देवे । बैंगन, बेल, तैल और करेलेको नहीं खाये । तथा स्त्रीप्रसंग और क्रोधका त्याग कर देवे । इसके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको मृगांक रस कहते हैं ॥ ८-११ ॥ रत्नगर्भपोट्टली रस । रसं वज्रं हेम तारं नागं लौहञ्च ताम्रकम् । तुल्यांशं मरिचं देयं मुक्ताविद्रुममाक्षिकम् ॥ १२ ॥ शंखं तुत्थञ्च तुल्यांशं सप्ताहं चित्रकद्रवैः । मर्दयित्वा विचूर्ण्याथ तेन पूर्या वराटिका ॥ १३ ॥
( २८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । टङ्कणं रविदुग्धेन मुखं लिप्त्वा निरोधयेत् । मृद्भाण्डे तां निरुध्याथ सम्यग्गजपुटे पचेत् ॥१४॥ आदाय चूर्णयेत्सर्वं निर्गुण्ड्या सप्त भावयेत् । आर्द्रकस्य रसैः सप्त चित्रकस्य च विंशतिः ॥१५॥ द्रवैर्भाव्यं ततश्चास्य देयं गुञ्जाचतुष्टयम् । क्षयरोगं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः॥१६॥ योजयेत्पिप्पलीक्षौद्रैः सघृतैर्मरिचैस्तथा । महारोगाष्टके कासे श्वासे चैवातिसारके ॥ पोटलीरत्नगर्भोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १७ ॥ पारा, हीरा, सोना, चांदी, सीसा, लोहा, तांबा इन सबकी भस्म, काली मिरच, मोती, मूँगाभस्म, सोनामाखीभस्म, शंखकी भस्म और शुद्ध तूतिया इन सब औषधियोंको सम भाग लेकर और एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें सात दिन तक खरल करे। फिर इसको कौड़ीमें भरकर उसके मुखको आकके दूधमें पिसे हुए सुहागेसे बन्द कर देवे। फिर मिट्टीके सिकोरेमें रखकर ऊपरसे एक दूसरा सिकोरा ढक देवे और उसकी मूषा बनाकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर इसका चूर्ण कर ले । फिर सम्हालूके पत्तोंके रसकी सात भावना देवे, अदरखके रसकी सात भावना देवे और चित्रककी जड़के रसकी २० भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य क्षयरोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह औषधि आठ प्रकारके महारोग, खांसी, श्वास और अतिसारमें पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । अथवा कालीमिरचोंका चूर्ण और घृतके साथ प्रयोग करे । यह औषधि सर्वरोगनाशक है । इसको रत्नगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ १२-१७ ॥