रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२७१) हलीमकं निहन्त्याशु पाण्डुरोगं सकामलाम् । जीर्णज्वरं सविषममम्लपित्तमरोचकम् ॥ ३५ ॥ शूलं प्लीहोदरानाहमष्ठीलां गुल्मविद्रधिम् । शोथं मन्दानलं हिक्कां कासं श्वासं वमिं भ्रमम्॥३६॥ भगन्दरोपदंशं च दद्रुकण्डूव्रणानि च । दाहं तृष्णामुरुस्तम्भमामवातं कटीग्रहम् ॥ ३७ ॥ युक्तो मण्डेन मद्येन मुद्गयूषेण वारिणा । गुडूचीत्रिफलावासाक्वाथनीरेण वाक्वचित् ॥ ३८ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, अभ्रक भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, शंखकी भस्म, सुहागा और कौड़ीकी भस्म प्रत्येक आधा आधा पल, गोखुरुके बीज १ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके पटोलपात, पित्तपापड़ा, भारंगी, विदारीकंद, सौंफ, गिलोय, दंतीकी जड़, अडूसा,मकोय, इन्द्रायनकी जड़, पुनर्नवा, कुकुरभांगरा, शालिंच शाक, द्रोणपुष्पी ( गूमा ) इन प्रत्येक औषधिके आधे आधे पल स्वरसमें भावना देकर गोली बना लेवे, बकरीके दूधके साथ इन चौदह गोलियोंको चौदह दिनतक सेवन करे। इससे हलीमक, पांडुरोग, कामला, जीर्णज्वर, रक्तपित्त, अम्लपित्त, अरुचि, शूल, प्लीहा, उदर- रोग, आनाह, आष्ठीला, गुल्म, विद्रधि, शोथ, मंदाग्नि, हिक्का, खांसी, श्वास, वमन, भ्रम, भगन्दर, उपदंश, दद्रु, कण्डू, व्रण, दाह, तृषा, ऊरुस्तम्भ, आमवात और कमरकी पीड़ा यह सब शांत होते हैं। मांड, मदिरा, मूंगकका यूष,जल,गिलोयका क्वाथ,त्रिफलेका क्वाथ और अडूसेका क्वाथ इनमेंसे एक किसीके साथ इसका सेवन करे । इसको गहनानन्दनाथने चन्द्रसूर्यात्मक रस कहा है ॥ ३०-३८ ॥