भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( २८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । टङ्कणं रविदुग्धेन मुखं लिप्त्वा निरोधयेत् । मृद्भाण्डे तां निरुध्याथ सम्यग्गजपुटे पचेत् ॥१४॥ आदाय चूर्णयेत्सर्वं निर्गुण्ड्या सप्त भावयेत् । आर्द्रकस्य रसैः सप्त चित्रकस्य च विंशतिः ॥१५॥ द्रवैर्भाव्यं ततश्चास्य देयं गुञ्जाचतुष्टयम् । क्षयरोगं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः॥१६॥ योजयेत्पिप्पलीक्षौद्रैः सघृतैर्मरिचैस्तथा । महारोगाष्टके कासे श्वासे चैवातिसारके ॥ पोटलीरत्नगर्भोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १७ ॥ पारा, हीरा, सोना, चांदी, सीसा, लोहा, तांबा इन सबकी भस्म, काली मिरच, मोती, मूँगाभस्म, सोनामाखीभस्म, शंखकी भस्म और शुद्ध तूतिया इन सब औषधियोंको सम भाग लेकर और एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें सात दिन तक खरल करे। फिर इसको कौड़ीमें भरकर उसके मुखको आकके दूधमें पिसे हुए सुहागेसे बन्द कर देवे। फिर मिट्टीके सिकोरेमें रखकर ऊपरसे एक दूसरा सिकोरा ढक देवे और उसकी मूषा बनाकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर इसका चूर्ण कर ले । फिर सम्हालूके पत्तोंके रसकी सात भावना देवे, अदरखके रसकी सात भावना देवे और चित्रककी जड़के रसकी २० भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य क्षयरोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यह औषधि आठ प्रकारके महारोग, खांसी, श्वास और अतिसारमें पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । अथवा कालीमिरचोंका चूर्ण और घृतके साथ प्रयोग करे । यह औषधि सर्वरोगनाशक है । इसको रत्नगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ १२-१७ ॥