रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २८३ ) मृगाङ्कसंज्ञको ज्ञेयो राजयक्ष्मनिकृन्तनः । गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य मरिचैः सह भक्षयेत् ॥ ९ ॥ पिप्पलीदशकैर्वापि मधुना सह लेहयेत् । पथ्यन्तु लघुभिर्मांसैः प्रयोगेऽस्मिन्प्रयोजयेत् ॥१०॥ व्यञ्जनैर्घृतपक्वैश्च संस्कृतैर्ह्यविदाहिभिः ॥ वृन्ताकबिल्वतैलानि कारवेल्लं च वर्जयेत् ॥ स्त्रियं परिहरेद्दूरं कोपञ्चापि विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ पारा १ भाग, सोनाभस्म १ भाग, मोती २ भाग, गंधक ३ भाग और सुहागा १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र कांजीमें पीसकर गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर नमकसे भरी हुई हाँडीमें उस मूषाको रखकर चार प्रहर तक पकावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर काली मिरचोंके चूर्णके साथ; अथवा दश पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेव- नके अंतमें लघु ( हलके ) मांसको घृतके द्वारा संस्कार किये हुए और परिपक्व हुए व्यञ्जन और अविदाही पदार्थ पथ्य देवे । बैंगन, बेल, तैल और करेलेको नहीं खाये । तथा स्त्रीप्रसंग और क्रोधका त्याग कर देवे । इसके सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको मृगांक रस कहते हैं ॥ ८-११ ॥ रत्नगर्भपोट्टली रस । रसं वज्रं हेम तारं नागं लौहञ्च ताम्रकम् । तुल्यांशं मरिचं देयं मुक्ताविद्रुममाक्षिकम् ॥ १२ ॥ शंखं तुत्थञ्च तुल्यांशं सप्ताहं चित्रकद्रवैः । मर्दयित्वा विचूर्ण्याथ तेन पूर्या वराटिका ॥ १३ ॥