रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तान्सर्वानाशयेदाशु बलवर्णाभिवर्द्धनः । सम्मोहलोहनामायं पाण्डुरोगे च पूजितः ॥ ५० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, चित्रक, वायविडङ्ग, लोहभस्म, अभ्रकभस्म यह सब समान भाग लेकर घृतमें गोलियां बनावे । यह रस सेवन करनेसे कामला, पाण्डुरोग, हृद्रोग, शोथ, भगन्दर, कोष्ठगतक्रिमि, मन्दाग्नि, अरुचि इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है और बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाला है; पाण्डुरोगके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है । इसको सम्मोह लोह कहते हैं ॥ ४८-५० ॥ त्र्यूषणादि मण्डूर । स्विन्नमष्टगुणे मूत्रे लौहकिट्टं सुशोधितम् । पाकान्ते त्र्यूषणं वह्निवरादार्वीसुरद्रुमान् ॥ ५१ ॥ विडंगबीजचूर्णञ्च मुस्तं किट्टसमं क्षिपेत् । प्रातःकर्षं भजेदस्य जीर्णे तक्रौदनं भजेत् ॥ ५२ ॥ हलीमकं पाण्डुरोगमर्शांसि श्वयथुं तथा । ऊरुस्तम्भं जयेदेतत्कामलां कुम्भकामलाम् ॥५३॥ शुद्ध मण्डूरको आठ गुणे गोमूत्रमें पकाकर गाढ़ा करके त्रिकुटा, चित्रकमूल, त्रिफला, दारुहल्दी, देवदारु, वायविडंग, नागरमोथा यह सब मण्डूरके बराबर लेकर (कूटकपड़छानकर) मिलावे । इसमेंसे १ तोला परिमाण प्रातःकाल सेवन करे । औषधिके पचजानेपर भात और माठा खाना चाहिये । इससे हलीमक, पाण्डुरोग, बवासीर, शोथ, ऊरुस्तम्भ, कामला और कुम्भकामला यह सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ५१-५३ ॥