भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२७३) पकावे । जब पकते पकते गाढा हो जाये तब उसमें उपरोक्त पंच- कोलका चूर्ण डालकर एक एक तोलेकी वटी बना लेवे । एक एक वटी तक्रके साथ सेवन करनेसे पांडुरोग, मंदाग्नि, अरुचि, बवासीर, संग्- हणी, ऊरुस्तम्भ, कृमि, प्लीहा, आनाह और गलरोग नष्ट होते हैं । इसको मण्डूरवज्र वटक कहते हैं ॥ ४१-४४ ॥ लघ्वानन्द रस । पारदं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्गणञ्च चतुर्गुणम् ॥ ४५ ॥ भृङ्गराजरसैः सप्त भावना चाम्लवेतसैः । गुञ्जाद्वयं पर्णखण्डे खादेत्सायं निहन्ति च ॥ ४६ ॥ पाण्डुतामरुचिश्चैव मन्दाग्निं ग्रहणीं ज्वरम् । वातश्लेष्मभवान् रोगाञ्जयेदचिरसेवनात् ॥ ४७ ॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, विष और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, काली मिरच आठ भाग, सुहागा चार भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके भांगरेके रसकी सात भावना और खट्टे अनारके बीजोंके रसकी सात भावना देकर दो २ रत्तीकी गोली बना कर पानके साथ सेवन करनेसे पाण्डुरोग, अरुचि, मन्दाग्नि, ग्रहणी, ज्वर, वातकफके विकार थोड़े ही समय सेवन करनेसे नष्ट होते हैं। इस- को लघ्वानन्द रस कहते हैं ॥ ४५-४७ ॥ सम्मोह लोह । त्रिकटुत्रिफलावह्निविडङ्गं लौहमभ्रकम् । एतानि समभागानि घृतेन वटिकां कुरु ॥ ४८ ॥ कामलां पाण्डुरोगञ्च हृद्रोगं शोथमेव च । भगन्दरं क्रिमिकोष्ठं मन्दानलमरोचकम् ॥ ४९ ॥