रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २७५ ) त्रिफलाया गुडूच्या वा दार्व्या निम्बस्य वा रसः । प्रातर्माक्षिकसंयुक्तः शीलितः कामलापहः ॥ ५४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे पाण्डुरोगाधिकारः । त्रिफला, गिलोय, दारुहल्दी और नीम इनके रसमें सहत डालकर सेवन करनेसे कामलारोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥ इति पाण्डुरोगचिकित्सा । अथ रक्तपित्तचिकित्सा । अर्केश्वर रस । मृतार्कं सूतवंगञ्च मृताभ्रञ्च समाक्षिकम् । अमृतास्वरसैर्भाव्यं त्रिसप्तकपुटे पचेत् ॥ १ ॥ वासा क्षीरविदारीभ्यां चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः । भक्षणाद्विनिहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ २ ॥ तांबा भस्म, पारद भस्म, वंग भस्म, अभ्रक भस्म और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर गिलोयके रसमें २१ वार भावना देकर पुटपाककी विधिसे पकाकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको अडूसा और विदारीकन्दके रसके साथ सेवन करनेसे दारुण रक्तपित्तरोग दूर होता है । इसको अर्केश्वर रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ सुधानिधि रस ! सूतं गन्धं माक्षिकञ्चैव लौहं सर्वं घृष्ट्वा त्रैफलेनोद- केन । लौहे पात्रे गोमयेऽग्नौ पुटित्वा रात्रौ दद्याद् रक्तपित्तप्रशान्त्यै ॥ ३ ॥