रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, गन्धक, सोनामाखीकी भस्म और लोहा भस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथमें लोहेके पात्रमें अरने उप- लोंकी अग्निके द्वारा पकावे । रात्रिके समय इस औषधिके सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इसको सुधानिधि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ आमलक्यादि लोह । आमला पिप्पलीलोहं तुल्यया सितया सह । रक्तपित्तहरं लौहं योगराजमिदं स्मृतम् ॥ ४ ॥ वृष्याग्निदीपनं बल्यमम्लपित्तविनाशनम् । पित्तोत्थानपि वातोत्थान्निहन्ति विविधान्गदान् ॥५॥ आमले, पीमल, लोहेका चूर्ण समानभाग और सबकी बराबर मिश्री मिलावे । सबको एकत्र पीसकर सेवन करनेसे रक्तपित्त रोग नष्ट होता है । इसको योगराज कहते हैं, इससे बलकी वृद्धि होती है और अग्नि दीप्त होती है । इससे अम्लपित्त प्रभृति वातिक, पैत्तिक और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं, इसको आमलक्यादि लोह कहते हैं ॥४॥५॥ शतमूल्यादि लोह । शतमूलीसिताधान्यानागकेशरचन्दनैः । त्रिकत्रयतिलैर्युक्तं लौहं सर्वगदापहम् ॥ तृष्णादाहज्वरच्छर्दिरक्तपित्तविनाशनम् ॥ ६ ॥ शतावर, मिश्री, धनिया, नागकेशर, चन्दन, त्रिकुटा, त्रिफला, त्रिजात और तिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बनाकर सेवन करनेसे तृषा, दाह, ज्वर, वमन और रक्तपित्त प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥