रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नसे पहिले, भोजनके मध्यमें और भोजनके अन्तमें सेवन करावे । जिस प्रकार सूर्योदयके होनेसे अन्धकारका समूह नष्ट होजाता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे कामला, पाण्डु और हलीमक रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकत्रयाद्य लोह कहते हैं ॥ १६-१९ ॥ विडंगादि लोह । विडंग-मुस्त-त्रिफला-देवदारु-षडूषणैः । तुल्यमात्रमयश्चूर्णं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ २० ॥ तैरक्षमात्रां गुटिकां कृत्वा खादेद्दिनेदिने । कामलापांडुरोगार्त्तः सुखमापद्यतेऽचिरात् ॥ २१ ॥ वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु और षडूषण ( पीपल पीपलामूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, और मरिच ) यह प्रत्येक औषधि समान भाग और सबकी बराबर लोहाभस्म लेवे और लोहेसे अठगुना गोमूत्र लेवे। प्रथम लोहेके चूर्णको और गोमूत्रको एकत्र मिलाकर एक हांडीमें रखकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गोमूत्र जल जाय केवल लोहा बाकी रहजाय तब उतारकर उपरोक्त विडंगादि चूर्ण मिलाकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली खानेसे कामला और पाण्डुरोग नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है । इसको विडंगादि लोह कहते हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ विडंगत्रिफलाव्योषं शुद्धलोहन्तु तत्समम् । पुरातनगुडेनात्र लेहयेद्दिनसप्तकम् ॥ श्वयथुं नाशयेच्छीघ्रं पाण्डुरोगहलीमकम् ॥ २२ ॥ अन्य विडंगादि लोह-वायविडंग, त्रिफला और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पुराने गुड़में मिलाकर सात दिन खानेसे शोथ, पाण्डुरोग और हलीमक रोग नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥