रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २६७ ) सोंठ, मिरच, पीपलामूल और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, नागकेशर १ कर्ष और एरण्डके बीज एक पल लेवे, सबको एकत्र पीस लेवे और सबके बराबर पुराना गुड़ लेवे, सबको एकत्र मिलाकर धतूरेके रसमें भावना देकर घीके योगसे बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना नित्यप्रति रात्रिके समय एक गोली खाये । यह गोली पांडुरोगको नष्ट करती है । इसको कामेश्वर रस कहते हैं ॥ १२–१५ ॥ त्रिकत्रयाद्य लोह । पलं लौहस्य किट्टस्य पलं गव्यस्य सर्पिषः । सितायाश्च पलञ्चैकं क्षौद्रस्यापि पलं तथा ॥ १६ ॥ तोलैकं कान्तलौहस्य त्रिकत्रयसुभावितम् । ततः पात्रे विधातव्यं लोहे च मृन्मये तथा ॥ १७ ॥ हविषा भावितञ्चापि रौद्रे च शिशिरे तथा । भोजनादौ तथा मध्ये चान्ते चापि प्रदापयेत् ॥१८॥ अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् । कामलां पाण्डुरोगञ्च हलीमकं सुदारुणम् ॥ निहन्ति नाऽत्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा॥१९॥ मण्डूर १ पल, गायका घी १ पल, मिश्री १ पल, शहद १ पल और कांतलोहेकी भस्म १ तोला परिमाण लेवे । प्रथम लोहे और मण्डूरको एकत्र पीसकर; घी मिलाकर त्रिकत्रय ( हरड़, बहेड़ा, आमला; सोंठ,मरिच,पीपल, दालचीनी,इलायची और नागकेशर ) के क्वाथमें सात और घृतमें सात लोहेके अथवा मिट्टीके पात्रमें भावना देवे । सूर्योदयके समय क्वाथकी और रात्रिमें सरदीके समय घृतसे भावना देवे;जब भावना समाप्त हो जायें तब मिश्री और शहद मिलावे । दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसका भोज-