रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२६९) त्रैलोक्यसुन्दर रस । मानश्चैकं चतुःसूतं षडभ्रं वसुलौहकम् । गन्धकं त्रिफलाव्योषं चूर्णं मोचरसस्य च ॥ २३ ॥ मुसली चामृतासत्त्वं प्रत्येकं पञ्चभागिकम् । भावयेत्सर्वमेकत्र त्रिफलानां कषायके ॥ २४ ॥ भावना विंशतिर्देया दशरात्रं सुभावना । शिग्रुचित्रकमूलाभ्यामष्टधा च पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरो नाम रसो निष्कमितो हितः । सितया च समं क्षौद्रैः शोथपाण्डुक्षयापहः ॥ ज्वरातिसारसंयुक्तसर्वोपद्रवनाशनः ॥ २६ ॥ मानकन्द १ भाग, पारा ४ भाग, अभ्रक भस्म ६ भाग, लोहेकी भस्म ८ भाग, गंधक, त्रिफला, त्रिकुटा, मोचरस, मुसली और गिलो- यका सत्त्व यह प्रत्येक पांच पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर दश दिनतक त्रिफलेके क्वाथकी बीस भावना देवे । पश्चात् सहंजिनेके रसमें आठ भावना देवे और चित्रककी जड़के रसमें आठ भावना देवे । इसमेंसे नित्य चार मासे औषधि मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सूजन, पांडु, क्षयरोग और सर्वोपद्रवसंयुक्त ज्वरातिसार नष्ट होते हैं । इसको त्रैलोक्यसुन्दररस कहते हैं ॥ २३-२६॥ दार्वादि लोह । दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गान्ययसो रजः । मधुसर्पिर्युतं लिह्यात्कामलापाण्डुरोगवान् ॥ २७ ॥ दारुहल्दीकी छाल, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्मका चूर्ण १०