रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विधिना मर्दयित्वा तु कर्षमात्रं तु भक्षयेत् । धारोष्णपयसा युक्तं प्रातरेव समुत्थितः ॥ १२ ॥ पित्तं तथाऽम्लपित्तञ्च रक्तपित्तं विशेषतः । निहन्ति सर्वदोषं च ज्वरं सर्वं न संशयः ॥ रसामृतरसो नाम गहनानन्दभाषितः ॥ १३ ॥ पारा १ भाग, गंधक, सोनामाखी भस्म, शिलाजीत, लालचन्दन, गिलोय, दाख, महुवेके फूल, धनिया, इन्द्रजौ, कुड़ेकी छाल, धायके फूल, नीमके पत्ते, मुलैठी, शहद और मिश्री यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग लेवे, इन सबको विधिवत् एकत्र खरल करके प्रातःकाल मुख धोकर एक कर्ष परिमाण भक्षण करे और ऊपरसे धारोष्ण दूध पीवे । इसके सेवन करनेसे पित्तरोग, अम्लपित्त, रक्तपित्त और ज्वर निश्चय नष्ट होते हैं। इसको स्वयं गहनानन्दनाथने कहा है । इसको रसामृत रस कहते हैं ॥ १०-१३ ॥ खण्डकूष्माण्ड । कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् । पचेत्तते घृतप्रस्थे शनैस्ताम्रमये दृढे ॥ १४ ॥ यदा मधुनिभः पाकस्तदा खण्डं शतं न्यसेत् । पिप्पलीशृङ्गवेराभ्यां द्वे पले जीरकस्य च ॥ १५ ॥ त्वगेलापत्रमरिचधान्यकानां पलार्द्धकम् । न्यसेच्चूर्णीकृतं तत्र दर्व्या संघट्टयेत्पुनः ॥ १६ ॥ तत्पक्वं स्थापयेद्भाण्डे दत्त्वा क्षौद्रं घृतार्द्धकम् । तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तपित्तक्षतक्षयी ॥ १७ ॥ उत्तम प्रकारसे पका हुआ एक पेठा लेकर उसको छीलकर उसके बीज निकाल डाले । इसको अच्छे कली किये हुए पात्रमें पकाकर निचोड़ लेवे और छिलके रहित पेठेके टुकड़े १०० पल लेवे । फिर