भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( २७९ ) इसको उत्तम कली किये हुए तांबेके पात्रमें डालकर एक प्रस्थ घृतमें पकावे। जब पकते पकते शहदके समानवर्ण होजाय तब १०० पल खांडकी चासनी उसी पेठेमेंसे निकले हुए जलसे बनाकर डाले तथा पीपल, अदरख और जीरा इन प्रत्येकका चूर्ण आठ आठ तोले; दाल- चीनी, इलायची, तेजपात, कालीमिरच और धनिया प्रत्येकका चूर्ण दो दो तोले, सबको मिलाकर अच्छे प्रकारसे करछीसे चलाकर एक- जीव करके रख देवे। फिर घृतसे आधा भाग शहद डालकर एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसका अग्निके बलानुसार रक्तपित्त, क्षत और क्षयरोगी सेवन करे ॥ १४-१७ ॥ शर्कराद्य लोह । शर्करातिलसंयुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः। रक्तपित्तं निहन्त्याशु चाम्लपित्तहरं परम् ॥ १८ ॥ मिश्री, तिलका चूर्ण, हरड़का चूर्ण, बहेड़ेका चूर्ण, आमलोंका चूर्ण, सोंठका चूर्ण, पीपलका चूर्ण, काली मिरचोंका चूर्ण, चित्रकका चूर्ण, नागरमोथेका चूर्ण और वायविडंगका चूर्ण यह प्रत्येक एक एक भाग और सब चूर्णकी बराबर लोहाभस्म लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे रक्तपित्त और अम्लपित्त रोग नष्ट होते हैं। इसको शर्कराद्य लोह कहते हैं ॥ १८ ॥ समशर्कर लोह । लोहाच्चतुर्गुणं क्षीरमाज्यं द्विगुणमुत्तमम् । चूर्णं पादन्तु वैडङ्गं दद्यान्मधुसिते समे ॥ १९ ॥ ताम्रपात्रे दृढे पक्त्वा स्थापयेद् घृतभाजने । माषकादिक्रमेणैव भक्षयेद्विधिपूर्वकम् ॥ २० ॥ अनुपानं प्रयुञ्जीत नारिकेलोदकादिकम् । रक्तपित्तं जयेत्तीव्रमम्लपित्तं क्षतक्षयम् । प्रकृष्टकान्तिजननमायुष्यमुत्तमोत्तमम् ॥ २१ ॥