भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 584 में से

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पृष्ठ 306

( २८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहभस्म १ भाग, दूध, ४ भाग, घृत २ भाग, वायविडंगका चूर्ण चौथाई भाग, मिश्री एक भाग और सहत १ भाग लेवे । प्रथम लोह भस्म, दूध और घृत इनको एकत्र करके एक दृढ तांबेके पात्रमें मंद मंद अग्निसे पकावे । जब पकते पकते गाढ़ा होजाय तब वायविडंगका चूर्ण और मिश्री डाल देवे । पाक सिद्ध होनेपर चूल्हे परसे उतार लेवे । शीतल होनेपर शहद मिलाकर एक घीके चिकने बासनमें भर- कर रख देवे । इस औषधिको पहिले दिन एक मासा, दूसरे दिन दो मासे और तीसरे दिन तीन मासे इस प्रकार प्रतिदिन छः दिन तक एक एक मासा बढ़ाकर खाये। इसके सेवन करनेके पश्चात् नारियलका जल पान करे । इससे रक्तपित्त, अम्लपित्त, क्षत और क्षयरोग नष्ट होते हैं । यह आनन्दजनक कांतिको उत्पन्न करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है । इसको समशर्कर लोह कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ कपर्दक रस । मृतं वा मूर्च्छितं सूतं कार्पासकुसुमद्रवैः । मर्दयेद्दिनमेकन्तु तेन पूर्या वराटिका ॥ २२ ॥ निरुध्य चान्धमूषायां भाण्डे रुद्धा पुटे पचेत् । उद्धृत्य चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं मरिचैर्द्विगुणैः सह ॥ २३ ॥ गुञ्जामात्रां घृतेनैव भक्षयेत्प्रातरुत्थितः । उदुम्बरं घृतञ्चैव अनुपानं प्रयोजयेत् ॥ कपर्दको रसो नाम रक्तपित्तविनाशनः ॥ २४ ॥ पारेकी भस्मको अथवा मूर्च्छित पारेको लेकर कपासके फूलोंके रसमें एक दिनतक खरल करके कौड़ियोंमें भरकर उसका मुख बंद कर देवे । फिर उन कौड़ियोंको अन्धमूषामें रखकर पुटपाक करे; शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो भाग काली मिरचोंका चूर्ण मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंका घृतके

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