रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (९५) सिंगियाविष ( तेलिया मिट्टी या बच्छनाग ) लेकर उसके चणेके समान छोटे २ टुकडे करे, इनको तीन दिन गोमूत्रमें भिगोकर रक्खे चौथे दिन निकाल कर समभाग सुहागा डालकर पीस ले, जब सूख जाये तो सिंगिये विषको मरा हुआ ( या शुद्ध ) जानना, यह औषधि- योंमें मिलाने योग्य शुद्ध विष होजाता है ॥ ७४ ॥ अन्यप्रकारसे विषशोधन । अथवा त्रैफले क्वाथे विषं शुद्धयति पाचितम् । दोलायां त्रिफलाक्वाथे छागीक्षीरे च पाचितम्॥७५॥ त्रिफलेके क्वाथमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकानेसे भी विष शुद्ध होजाता है । अथवा बकरीके दूधमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकावे तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७५ ॥ गोमूत्रपूर्णपात्रे च दोलायन्त्रे विषं पचेत् । दशतोलकमानेन चादौ वैद्यो दिवानिशम् ॥ ७६ ॥ अथवा दश तोला विषके छोटे २ ठुकडे कर पोटलीमें बांध गोमू- त्रसे भरे पात्रमें एक दिन रात दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे, फिर निकाल गर्म जलसे धोकर सुखा ले तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७६ ॥ विषभागाँश्चणकवत्स्थूलान्कृत्वा तु भाजने । तत्र गोमूत्रकं दत्त्वा प्रत्यहं नित्यनूतनम् ॥ ७७ ॥ शोषयेन्त्रिदिनादूर्ध्वं धृत्वा तीव्रातपे ततः । प्रयोगेषु प्रयुञ्जीत भागमानेन तद्विधम् ॥ ७८ ॥ अथवा विषको चनेके समान छोटा छोटा करके मट्टीके पात्रमें रक्खे इसमें गोमूत्र डाल दे और एक दिन रक्खा रहने दे, दूसरे दिन पहला गोमूत्र निकालकर फेंक दे और नवीन ( ताजा ) गोमूत्र उसमें