रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १०३ ) एक एक रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इसको गद्सुरारि इच्छाभेदी रस कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे इच्छानुसार विरेचन होजाता है । तथा सन्निपातादि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं, इसपर विरेचन होजा- नेके पश्चात् दहीभात पथ्य दे और रोगीको मत्स्य मांसादि सर्व पदार्थ घृतमें भूनकरके भोजनके लिये दे सकते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ रुक्मिश रस । अभयाचूर्णमादाय नूतनैर्जयपालकैः । पञ्चमांशेन मिलितैः स्नुहीदुग्धेन मर्दिताः ॥ ८ ॥ गुडिकास्तस्य कर्तव्या वर्तुलाश्चणकप्रभाः । ( एकैकस्यास्य टङ्कस्य रेचनैश्च रसैस्तदा ॥ ९ ॥ ) प्रथम उत्तम हरड़ोंका चूर्ण करके फिर उसमें पंचमांश नवीन जमालगोटेका चूर्ण मिलाकर थूहरके दूधमें अच्छे प्रकारसे मर्दन करके चनेकी बराबर गोली बांधे, इस रसको एक टंक तक रेचनरसोंके अनुपानसे दे सकते हैं ॥ ८ ॥ ९ ॥ रुक्मिशो न च दाहः स्यान्न च मूर्च्छाभ्रमः क्लमः । वेगतः सारयेदेषा विशेषादामनाशिनी ॥ १० ॥ निरूहेन तथा नैव तथा बिन्दुघृतेन च । त्रिवृता न तथा रेच्या यथा स्याद्गुडिकोत्तमा ॥ ११॥ इस रुक्मिश रसके सेवन करनेसे दाह, मूर्छा, भ्रम, क्लम इत्यादि कोई भी उपद्रव न होकर वेगपूर्वक दस्त होजाते हैं तथा आमदोष नष्ट होजाता है । जिस प्रकार सुखपूर्वक इस औषधिके सेवन करनेसे विरेचन होजाता है इस प्रकार निरूहण ( बस्तिकर्म ), बिन्दुघृत तथा निशोथके चूर्ण आदि किसीसे विरेचन नहीं होता ॥ १० ॥ ११ ॥ अतिशुद्धं भवेदेवमतिप्रबलमुत्तमम् । अतिरूपमतिप्रौढमत्यायुष्करमुत्तमम् ॥ १२ ॥