रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विष्टम्भे गुडिका देया चोदरे दारुणामये । अधोदेशेषु सर्वेषु गदेषु च महौषधिः । दीयते क्षीयते सामः कामकायविवर्द्धनः ॥ १३ ॥ इस रुक्मेश रसके सेवन करनेसे शरीर शुद्ध होजाता है तथा सुंदर और दृढ़ होजाता है। एवं अत्यन्त बलवान् होता है। यौवन स्थिर रहता है और आयुकी वृद्धि होती है । विष्टम्भाजीर्ण, कठिन उदरामय, अधोगत सर्व प्रकारके रोग और गुह्यद्वारोद्भव रोगादिकोंकी यह उत्तम औषधि है। इसके सेवन करनेसे आमदोष नष्ट होकर काम और शरीरकी शोभाकी वृद्धि होती है ॥ १२ ॥ १३ ॥ इच्छाभेदी गुटिका । पारदं गन्धकं कुर्यात्सौभाग्यं पिप्पलीसमम् । समानि जयपालानि क्रियन्ते रेचनाय च । शीतेन रेचयेत्सम्यगुष्णेनैव प्रशाम्यति ॥ १४ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सुहागा और पीपल यह सब समान भाग और सबकी बराबर शुद्ध जमालगोटे लेवे, इन सबको एकत्र खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बना लेवे, एक गोली शीतल जलके साथ सेवन करे। इसपर शीतल जलादिक शीतल क्रिया करनेसे दस्त होते हैं और उष्णजल पान आदि उष्णक्रिया करनेसे दस्त बंद हो जाते हैं। इसको 'इच्छाभेदी गुटिका' कहते हैं ॥ १४ ॥ दूसरा इच्छाभेदी रस । शुण्ठीमरीचसंयुक्तं रसगन्धकटङ्कणम् । जैपालास्त्रिगुणाः प्रोक्ताः सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥१५॥ इच्छाभेदी द्विगुञ्जः स्यात्सितया सह दापयेत् । यावन्तश्चिल्लुकाः पीतास्तावद्वारान्विरेचयेत् । तक्रौदनं खादितव्यमिच्छाभेदी यथेच्छया ॥१६॥