रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (१०५) सोंठ, मिरच, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग शुद्ध जमालगोटेका चूर्ण तीन भाग इन सबको एकत्र मिलाकर जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियां बनालेवे, इसमेंसे एक गोली लेकर मिश्रीके साथ सेवन करे और ऊप- रसे शीतल जल पीवे, इसपर जितने जलके घूट पान करेगा उतनी बार दस्त होंगे, जब अच्छे प्रकारसे दस्त होचुकें तो यथेच्छ तक्रके साथ भात खाना चाहिये ( इसको इच्छाभेदी रस कहते हैं ) ॥ १५॥१६॥ पुष्परेचनी गुटिका । देवदाली स्वर्णपुष्पं गुडेन वटकीकृतम् । गुदमध्ये प्रदेयैषा पातयेच्च महागदम् ॥ १७ ॥ अधश्च साममायाति पुनः सा दीयते गुदे । प्रक्षाल्य वारिणा चैषा वारंवारं प्रयच्छति ॥ १८ ॥ अनेन क्रमयोगेन मलमामं विरेचनम् । जायते सकलं देहं शुद्धवर्णं निरामयम् ॥ १९ ॥ बंदाल और अमलतासके गुदेको बराबर लेकर दुगुने गुडमें मर्दन करके वर्ती बनावे एक वर्तीको गुदामें प्रवेश करे, इससे अनेक प्रकारके दुःसाध्य रोग पतित होकर अच्छे प्रकारसे दस्त होजाते हैं । जबतक आमदोष अच्छे प्रकारसे न निकल जाये तबतक बराबर वर्ती रखे । एक वर्तीको निकालकर जलसे गुह्यद्वारको धोकर फिर दूसरी वर्ती प्रवेश करनी चाहिये इस प्रकार करनेसे आम और मल विरेचनद्वारा निकलकर शरीर शुद्ध और निरोग हो जाता है ॥ १७-१९ ॥ सर्वाङ्गसुन्दर रस । शुद्धसूतञ्च गन्धञ्च विषञ्च जयपालकम् । कटुत्रयञ्च त्रिफला टङ्कणञ्च समांशकम् ॥ २० ॥