भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अस्य मात्रा प्रयोक्तव्या गुञ्जात्रयसमा ततः । सर्वेषु ज्वररोगेषु सामवाते विशेषतः ॥ २१ ॥ नाशयेच्छ्वासकासञ्च अग्निमान्द्यं विशेषतः । ब्रह्मणा निर्मितः पूर्वं रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥ २२ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, शुद्ध जमालगोटे, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला और सुहागा इन सब औषधियोंका चूर्ण समान भाग लेकर एकत्र खरल करके तीन २ रत्तीकी गोली बना लेवे ( एक गोलीकी मात्रा है ) सर्व प्रकारके ज्वर और आम- वातमें यह औषधि विशेष करके हितकारी है तथा श्वास, खांसी और मन्दाग्निको नष्ट करता है। यह सर्वाङ्गसुन्दर रस पूर्वकालमें ब्रह्माजीने स्वयं निर्माण किया था ॥ २०-२२ ॥ अविरेचनीय रोगी । बालवृद्धकृशक्षीणपीनसार्त्तभयार्दिताः । रूक्षशोषतृषायुक्ता गर्भिणी च नवज्वरी ॥ २३ ॥ अधो गच्छति यस्यासृक् सूतिकातङ्कपीडिता । नैते विरेकयोग्याः स्युरन्येषाञ्च बलाबलम् ॥ २४ ॥ नवज्वरे च ये योगा भेदकाः परिकीर्त्तिताः । ते तथैव प्रयोक्तव्या वीक्ष्य देहमलादिकम् ॥ २५ ॥ अब विरेचनके अयोग्य रोगियोंको कहते हैं-बालक, वृद्ध, कृश, क्षीण, पीनसरोगी, भयातुर, रूक्ष, शोष और तृषासे पीडित, गर्भवती स्त्री, नवीन ज्वरवाला, अधोगत रक्तपित्त रोगी और सूतिका रोग- वाली स्त्री इन सबको विरेचन नहीं देना चाहिये । इनके अतिरिक्त अन्यान्य रोगोंमें रोगीका बलाबल विचारकर विरेचन देना चाहिये । नवीनज्वरमें जो भेदक योग कहे हैं वही योग देवे और दोष दूष्यादि