भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

भाषाटीकासहित । ( १०७ ) विचार करही इन विरेचन योगोंका जैसे उचित हो वैसे प्रयोग करना चाहिये ॥ २३-२५ ॥ इति विरेकाधिकारः ॥ अथ ज्वरचिकित्सा । नवज्वरांकुश रस । क्रमेण वृद्धात्रसगन्धहिंगुलान्नैकुम्भबीजान्यथ दन्ति- वारिणा । पिष्ट्वास्य गुञ्जाभिनवज्वरापहा जलेन चार्द्रासितया प्रयोजिता ॥ १ ॥ ज्वर संपूर्ण रोगोंमें प्रधान है अतएव प्रथम ज्वरकी चिकित्सा कहते हैं-पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सिंगरफ ३ भाग और जमा- लगोटे ४ भाग इन सबको विधिपूर्वक रगड़ करके दन्तीके क्वाथकी सात बार भावना देवे और फिर एक एक रत्तीकी गोली बनालेवे एक गोली मिश्रीके शर्बतके साथ सेवन करे, इसके सेवन करनेसे दस्त होकर नवीन ज्वर नष्ट होजाता है । इसको नवज्वरांकुश रस कहते हैं ( जहांपर किसी भी योगमें पारा और गंधक हो वह पहले कज्जली करके ही मिलाना चाहिये ) ॥ १ ॥ हिंगुलेश्वर रस । तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले पिप्पली हिंगुलं विषम् । द्विगुञ्जा मधुना देया वातज्वरनिवृत्तये ॥ २ ॥ पीपल, सिंगरफ और विष यह तीनों औषधि समान भाग लेकर खरलमें अच्छे प्रकारसे मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे इसको शहदके साथ खाये इससे वातज्वर नष्ट होजाता है इसको हिंगु- लेश्वर रस कहते हैं ॥ २ ॥ ज्वरधूमकेतु । भवेत्समं सूतसमुद्रफेनहिंगूलगन्धं परिमर्द्य यत्नात् । नवज्वरे वल्लमितं त्रिघस्रमार्द्राम्बुनायं ज्वरधूमकेतुः३