भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( १०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, समुद्रफेन, सिंगरफ और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन दिन तक खरल करे और फिर तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे इसको "ज्वरधूमकेतु"रस कहते हैं। इसका अद- रखके रसके साथ सेवन करनेसे नवीन ज्वर नष्ट होजाता है ॥ ३ ॥ मृत्युञ्जय रस । विषस्यैकं तथा भागं मरिचं पिप्पली कणा । गन्धकस्य तथा भागं भागं स्याट्टङ्गणस्य च ॥ ४ ॥ सर्वत्र समभागं स्याद्धिङ्गुलन्तु द्विभागिकम् । चूर्णयेत्खल्वमध्ये तु मुद्गमानां वटीञ्चरेत् ॥ ५ ॥ जम्बीरस्य रसेनात्र कार्यं हिङ्गुलशोधनम् । रसश्चेत्समभागं स्याद्धिङ्गुलं नेष्यते तदा ॥ ६ ॥ गोमूत्रशोधितञ्चात्र विषं सौरविशोधितम् । मृत्युरूपं ज्वरं हन्ति मृत्युञ्जयरसः स्मृतः ॥ ७ ॥ मृत्युर्विनिर्जितो यस्मात्तेन मृत्युञ्जयो रसः । अव्यक्तः सिद्धिदः शुद्धो रोगघ्नः कीर्त्तिवर्द्धनः ॥ ८ ॥ यशःप्रदः शिवः साक्षान्मृत्युञ्जयरसः स्मृतः । मधुना लेहनं प्रोक्तं सर्वज्वरनिवृत्तये ॥ ९ ॥ विष, मरिच, पीपल, गंधक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, सिंगरफ दो भाग इन सबको एकत्र जलमें खरल करके मूँगकी बराबर गोली बना लेवे इसमें सिंगरफ जम्बीरी नींबूके रसमें शुद्ध करके लेना चाहिये और जो इसमें सिंगरफ नहीं डालना होय तो शुद्ध पारा एक भाग डालना चाहिये इसमें विष गोमूत्रमें भावना देकर धूपमें सुखाकर ग्रहण करना चाहिये। यह औषधि मृत्युरूप ज्वरको हरण करती है इस कारण इसको मृत्युञ्जय रस कहते हैं। यह औषधि