रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १०९ ) अव्यक्त अर्थात् अनिर्वचनीय शक्ति, सब प्रकारकी सिद्धिको देनेवाला परम शुद्ध रोगनाशक कीर्तिवर्द्धक और यशप्रद है। इस मृत्युञ्जय रसको साक्षात् शिवजीने कहा है, इसको शहदके साथ चाटनेसे सब प्रकारके ज्वर निवृत्त होते हैं ॥ ४-९ ॥ दध्युदकानुपानेन वातज्वरनिबर्हणः । आर्द्रकस्य रसैः पानं दारुणे सन्निपातिके ॥ १० ॥ जम्बीरद्रवयोगेन अजीर्णज्वरनाशनः । अजाजी गुडसंयुक्ता विषमज्वरनाशिनी ॥ ११ ॥ दहीके तोडके साथ सेवन करनेसे वातज्वर नष्ट होता है। अद- रखके रसके साथ सेवन करनेसे दारुण सान्निपातिक ज्वर नष्ट होता है। जम्भीरी नींबूके रसके साथ सेवन करनेसे अजीर्ण और ज्वर नष्ट होते हैं। काला जीरा और गुड़ मिलाकर खानेसे विषमज्वर नष्ट होता है ॥ १० ॥ ११ ॥ तीव्रज्वरे महाघोरे पुरुषे यौवनान्विते । पूर्णमात्रा प्रदातव्या पूर्णं वटिचतुष्टयम् ॥ १२ ॥ स्त्रीबालवृद्धक्षीणेषु अर्द्धमात्रा प्रकीर्तिता । अतिवृद्धे च क्षीणे च शिशौ चाल्पवयस्यपि ॥१३॥ तुर्यमात्रा प्रदातव्या व्यवस्था सारनिश्चिता । नवज्वरे महाघोरे यामैकान्नाशयेद्ध्रुवम् ॥ १४ ॥ मध्यज्वरं तथाजीर्णे त्रिरात्रान्नाशयेद्ध्रुवम् । सप्ताहात्सन्निपातोत्थंज्वराजीर्णकसंज्ञकम् ॥ १५ ॥ युवा पुरुषको अत्यन्त तीव्र घोरतर ज्वर उत्पन्न होनेपर पूर्ण मात्रा अर्थात् चार गोली देनी चाहिये । स्त्री, बालक, वृद्ध और क्षीण मनुष्यको अर्धमात्रा अर्थात् दो गोली देनी चाहिये । अत्यंत वृद्ध, ५