रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अत्यंत क्षीण और बहुत थोड़ी उमरके बालकको चौथाई अर्थात् एक गोली देनी चाहिये । इसके सेवन करनेसे एक प्रहरमें अत्यंत घोरतर नवीन ज्वर, तीनरात्रिमें मध्यम ज्वर और अजीर्ण ज्वर, एवं एक सप्ताहमें सान्निपातिक ज्वर नष्ट होजाता है ॥ १२–१५ ॥ जया वटी । विषं त्रिकटुकं मुस्तं हरिद्रा निम्बपत्रकम् । विडंगमष्टमं चूर्णं छागमूत्रैः समं सम् ॥ चणकाभा वटी कार्या स्याज्जया योगवाहिका १६॥ विष, सोंठ, मिर्च, पीपल, नागरमोथा, हल्दी, नीमके पत्ते और वायविडंग यह आठ औषधि समान भाग लेकर बकरीके मूत्रमें अच्छे प्रकारसे खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे, इसको जयावटी कहते हैं । यह योगवाही है अर्थात् प्रत्येक अनुपानके साथ पृथक् पृथक् गुणोंको करती है ॥ १६ ॥ जयन्ती वटी । विषं पाठाश्वगन्धा च वचा तालीशपत्रकम् । मरिचं पिप्पली निम्बमजामूत्रेण तुल्यकम् ॥ १७ ॥ वटिका पूर्ववत्कार्या जयन्ती योगवाहिका ॥ १८ ॥ विष, पाठ, असगंध, वच, तालीशपत्र, कालीमिरच, पीपल और नीम इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर बकरीके मूत्रमें पीस- कर चनेकी बराबर गोली बना लेवे इसको जयन्ती वटी कहते हैं । यह भी जयाके समान योगवाही है ॥ १७ ॥ १८ ॥ जयाजयंती वटीके पथ्य और अनुपान । जयन्ती च जया वाथ क्षीरैः पित्तज्वरापहा । मुद्गामलकयूषेण पथ्यं देयं घृतं विना ॥ १९ ॥