भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित। ( १११ ) जयन्ती वा जया वाथ सक्षौद्रमरिचान्विता । सन्निपातज्वरं हन्ति रसश्चानन्दभैरवः ॥२०॥ जया अथवा जयंती वटीको दूधके साथ सेवन करनेसे पित्तज्वर नष्ट होता है और जया अथवा जयंती वटीके सेवन करनेवाला घृतके विना आमले और मूंगकी यूष पथ्य सेवन करे, जयावटी अथवा जयंतीवटीको शहद और काली मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपात ज्वर नष्ट होता है । अथवा आनंदभैरव रसके साथ सेवन करनेसे सन्निपात ज्वर नष्ट होता है ॥ १९ ॥ २० ॥ जयन्ती वा जया वाथ विषमज्वरनुद्धृतैः । सर्वज्वरं मधुव्योषैर्गवां मूत्रेण शीतकम् ॥२१॥ चन्दनस्य कषायेण रक्तपित्तज्वरापहा । जयन्ती वा जया वाथ माक्षिकेण चकासजित्॥२२॥ जयावटी अथवा जयन्ती वटीको घृतके साथ सेवन करनेसे विषम ज्वर नष्ट होता है । जया अथवा जयन्ती वटीको शहद और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है । जया अथवा जयन्ती वटीको गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे शीतज्वर नष्ट होता है । जया अथवा जयन्ती वटीको लाल चंदनके क्वाथके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्त ज्वर नष्ट होता है । जया अथवा जयन्ती वटीको शहदके साथ सेवन करनेसे खांसी दूर होती है ॥ २१॥ २२॥ जयन्ती वा जया क्षीरैः पाण्डुशोथविनाशिनी । जयन्ती वा जया वाथ तण्डुलोदकपानतः ॥२३॥ अश्मरीं हन्ति नो चित्रं मूत्रकृच्छ्रन्तु दारुणम् । जयन्तीं वा जयां वाथ गोमूत्रेण युतां पिबेत् ॥२४॥ हन्त्याशु काकणं कुष्ठं सुलेपेन च तद् द्रुतम् । द्विनिष्कं केतकीमूलं पिष्ट्वा तोयेन पाययेत् ॥२५॥