भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ११४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तांबेकी भस्म और शुद्ध विष समान भाग लेकर धतूरेके रसमें सौ बार भावना देवे । फिर आधी आधी रत्तीकी गोली बना लेवे, एक गोली अदरखके रसके साथ और सेंधानमकके साथ सेवन करनेसे नवीन ज्वर, सन्निपातज्वर इत्यादि सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेवाले मनुष्यको ईख ( गन्ना ) दाख मिश्री और दही इनका पथ्य देना चाहिये ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ज्वरसुरारि रस । हिंगुलञ्च विषं व्योषं टंकणं नागराऽभया । जयपालसमायुक्तं सद्योज्वरविनाशनम् ॥ ३६ ॥ हिंगुल ( सिंगरफ ), विष, त्रिकुटा, सुहागा, सोंठ और हरड यह प्रत्येक औषधि समान भाग ले इनका चूर्ण कर इस चूर्णकी बराबर जमालगोटेका चूर्ण लेवे, सबको एकत्रकर चनेकी बारबर गोली बना लेवे इसके सेवन करनेसे ज्वर तत्काल नष्ट होजाता है ॥ ३६ ॥ नवज्वरेभांकुश । सगन्धटंकं रसतालकञ्च विमर्दयेद्भावयेन्मीनपित्तैः । दिनद्वयं वल्लमितं प्रदद्याद्वृन्ताकतक्रौदनमेव पथ्यम्। नवज्वरेभांकुशनामधेयःक्षणेन घर्मोद्गममातनोति३७ गंधक, सुहागा, पारा और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर दो दिनतक बराबर मछलीके पित्तेकी भावना देवे और मछलीके पित्तेमें खरल करे । फिर तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे, इसको नवज्वरेभांकुश रस कहते हैं । इसके सेवन करनेसे तत्काल पसीना आकर सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसके सेवन करनेवालेको बैंगनकी भाजी और तक्रके साथ भात देना पथ्य है ॥ ३७ ॥ त्रैलोक्यडुम्बर रस । सूतार्कगन्धचपलाजयपालतिक्ता पथ्या त्रिवृच्च विष-