भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

भाषाटीकासहित । ( ११७ ) दूधमें खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे । इसके सेवनसे बलवान् तरुणज्वर, पाण्डुरोग, गुल्म, ग्रहणीरोग, बवासीर, वातजशूल, बढ़ा हुआ आमाजीर्ण, क्रिमिरोग, मलबद्धता और प्लीहारोग यह सब नष्ट होते हैं । इसको विद्याधर रस कहते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ अमृतमञ्जरी रस । हिंगुलं मरिचं टङ्कं पिप्पली विषमेव च । जातीकोषं समं सर्वं जम्बीराद्भिर्विमर्दितम् ॥ ४५ ॥ गुञ्जाद्वयं त्रयं वापि देयञ्च सन्निपातिके । कासश्वासौ जयत्याशु सर्वज्वरविनाशनः ॥ ४६ ॥ सिंगरफ, काली मिरच, सुहागा, पीपल, विष और जावित्री यह औषधि समान लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करे । इस औषधि- मेंसे दो रत्ती अथवा तीन रत्ती प्रमाण लेकर सान्निपातिक रोगमें प्रयोग करे । यह अमृतमंजरी रस खांसी, श्वास और सब प्रकारके ज्वरोंको नष्ट करता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ महाज्वरांकुश रस । सूतं गन्धं विषं तुल्यं धूर्त्तबीजं त्रिभिः समम् । चतुर्णां द्विगुणं व्योमचूर्णं गुञ्जाद्वयं हितम् ॥ ४७ ॥ जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसैर्युतम् । महाज्वरांकुशो नाम ज्वराष्टकनिषूदनः ॥ ४८ ॥ ऐकाहिकं द्व्याहिकं वा त्र्याहिकञ्च चतुर्थकम् । विषमञ्च त्रिदोषोत्थं हन्ति सर्वं न संशयः ॥ ४९ ॥ पारा, गन्धक और विष यह प्रत्येक औषधि एक भाग धतूरेके बीज तीन भाग और एकत्र मिली हुई त्रिकुटेकी औषधियोंका चूर्ण बारह भाग लेवे, इन सबको एकत्र करके खरल करे और दो दो