भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ११८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इसको महाज्वरांकुश रस कहते हैं, इसके जम्भीरी नींबूकी मज्जा और अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे आठ प्रकारके ज्वर तथा ऐकाहिक, द्वयाहिक, त्र्याहिक और चातुर्थिक विषमज्वर तथा सन्निपातज्वर नष्ट होते हैं ॥ ४७-४९ ॥ ज्वरकेशरिका । शुद्धसूतं विषं व्योषं गंधं त्रिफलमेव च । जयपालं समं कुर्याद् भृङ्गतोयेन मर्दयेत् ॥ ५० ॥ वटिकां गुञ्जमात्रान्तु कृत्वा वैद्यः प्रयत्नतः । प्रमाणं सर्षपाकारं बालानाञ्च प्रशस्यते ॥ ५१ ॥ नारिकेलाम्बुना वापि सर्वज्वरविनाशिनी । नारिकेलजलं शस्तं कर्षत्रयं पिबेदनु ॥ ५२ ॥ शुद्धपारा, विष, त्रिकुटा, गन्धक, त्रिफला और शुद्ध जमालगोटे यह सब औषधि समान भाग लेकर भांगरेके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियां बना लेवे । बालकोंको यदि यह रस देना हो तो सरसोंकी बराबर गोली बनावे । इस औषधिको तीन तोले नारियलके जलके साथ पान करे तो सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है ॥ ५०-५२ सितया च समं पीत्वा पित्तज्वरविनाशिनी । मरिचेन च पीता सा सन्निपातज्वरं जयेत् ॥ ५३ ॥ पिप्पलीजीरकाभ्यां तु दाहज्वरविनाशिनी । विषमज्वरभूतोत्थं ज्वरं प्लीहानमेव च ॥ ५४ ॥ अग्निमान्द्यमजीर्णञ्च श्वयथुञ्च सुदारुणम् । शूलाजीर्णे तथा गुल्मं कुष्ठाष्टादश पित्तजान् । ज्वरकेशरिका ख्याता तरुणज्वरनाशिनी ॥ ५५ ॥