रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ११९ ) इसको मिश्रीके साथ सेवन करे तो पित्तज्वर नष्ट हो । काली मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट हो । पीपल और जीरेके चूर्णके साथ सेवन करे तो तरुणज्वर, दाहज्वर, विषमज्वर, भूतोत्थज्वर, प्लीहा, मंदाग्नि, अजीर्ण, शोथ, शूल, गुल्म, अठारह प्रकारके कुष्ठ, सम्पूर्ण पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं. इसे ज्वरकेशरिका कहते हैं ॥ ५३-५५ ॥ नवज्वरेभासिंह । शुद्धसूतं तथा गन्धं लोहं ताम्रञ्च सीसकम् । मरिचं पिप्पलीं विश्वां समभागं विचूर्णयेत् ॥५६॥ अर्द्धभागं विषं दद्यान्मर्दयेद्वासरद्वयम् । शृङ्गवेरानुपानेन दद्याद् गुञ्जाद्वयं भिषक् ॥ ५७ ॥ नवज्वरे महाघोरे वातसंग्रहणीगदे । नवज्वरेभसिंहोऽयं सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा, गंधक, लोहभस्म, ताम्रभस्म, सीसाभस्म, मिरच, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और विष आधा भाग लेवे । इन सबको एकत्र करके दो दिन खरल करे फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे प्रबल नवज्वर, वातरोग, संग्रहणी इत्यादि सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इसको नवज्वरेभसिंह कहते हैं ॥ ५६-५८ ॥ उदकमञ्जरीरस ( निरामज्वरपर ) सूतो गन्धष्टङ्कणः सोषणः स्यादेतैस्तुल्या शर्करा मत्स्यपित्तैः । भूयो भूयो भावयेत्तत् त्रिरात्रं वल्लो देयः शृंगवेरस्य वारा ॥५९॥ सम्यक् तापे वारिभक्तं