भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सतक्रं वृन्ताकाढ्यं पथ्यमेव प्रदिष्टम् । अङ्गे रोगं हन्ति सामं प्रभावात्पित्ताधिक्ये मूर्ध्नि वारिप्रयोगः ६० पारा, गंधक, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । और विष ( किसीके मतसे मिश्री ) चार भाग लेवे । इन सबको एकत्र करके रोहू मछलीके पित्तमें अच्छे प्रकारसे खरल करके तीन दिन वारंवार भावना देवे । अधिक संताप उत्पन्न हो तो अदरखके रसके साथ इस औषधिको तीन रत्ती प्रमाण तीन दिन सेवन करे । रोगीको तक्रके साथ ठंडा भात भोजन करावे तथा बैंगनका शाक पथ्य देवे । पित्तकी विशेष प्रबलता हो तो रोगीके मस्तक पर जलकी धारा देवे । ( अथवा बर्फकी थैली मस्तक पर लगावे ) इस औषधिका सेवन करनेसे साम और निराम ज्वर नष्ट होता है । इसको उदकमञ्जरी रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ चन्द्रशेखर रस । अत्र·शर्करास्थाने मनःशिलायां चन्द्रशेखरो भवति ६१ इस उदकमञ्जरी रसमें विष ( किसीके मतसे मिश्री ) के स्थानमें शुद्ध मनसिल मिलानेसे चन्द्रशेखर रस हो जाता है । यह रस अनुपान विशेषसे पूर्वोक्त समस्त गुणोंको करता है ॥ ६१ ॥ पञ्चवक्त्र रस । रसो गन्धष्टंकणः सोषणोऽयं फणी पिप्पलीत्येष धूस्तूरपिष्टः । जयेत्सन्निपात द्विगुञ्जानुपानं भवे- दर्कमूलाम्बुसव्योषचूर्णम् ॥ ६२ ॥ पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, शीसाभस्म और पीपल यह सब औषधियें समान भाग लेकर धतूरेके रसमें अच्छी प्रकारके खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको आककी जड़के रसके साथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है । इसको पञ्चवक्त्र रस कहते हैं ॥ ६२ ॥