भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 584 में से

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भाषाटीकासहित । ( १२१ ) पर्पटीरस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं भृङ्गरसेन च । मृतं ताम्रं लोहभस्म पादांशेन तयोः क्षिपेत् ॥६३॥ लोहपात्रे च विपचेच्चालयेल्लोहचाटुना । तत्क्षिपेत्कदलीपत्रे गोमयोपरि संस्थिते ॥ ६४ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग इन दोनोंको एकत्र भांगरेके रसमें खरल करे फिर इसमें पारे और गंधकसे चौथाई भाग तांबेकी भस्म और लोहभस्म मिलाकर उत्तम विधिसे खरल करे फिर लोहेके कर- छेसे चलाकर लोहेके पात्रमें पकावे । जब देखे कि यह औषधि अच्छी प्रकारसे गल गई तब गोबरके ऊपर केलेका पत्ता रखकर उस पर इस औषधिको डाल देवे और ऊपरसे एक केलेका पत्ता ढक देवे और ऊपरसे गोबरसे दबा देवे । इस प्रकार करनेसे पर्पटी तय्यार होजाती है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ पश्चात्संचूर्णयेत्खल्ले निर्गुण्ड्या भावयेद्दिनम् । जयन्ती त्रिफला कन्या वासाभार्गीकटुत्रिकैः॥६५॥ भृङ्गाग्निमूलमुण्डीभिर्भावयेद्दिनसप्तकम् । अङ्गारैः स्वेदयेत्किञ्चित्पर्पटारख्यो महारसः ॥ ६६ ॥ चतुर्गुञ्जामितं भक्ष्यं सम्यक् श्लेष्मज्वरं जयेत् । पथ्याशुण्ठ्यमृताक्वाथमनुपानं प्रयोजयेत् ॥ ६७ ॥ इस पर्पटीको खरलमें पीसकर सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देवे । फिर जयन्ती, त्रिफला, घीकुमार, अडूसा, भारंगी, त्रिकुटा, भांगरा, चित्रककी जड़ और गोरखमुंडी इन सब औषधियोंके क्वाथ और रसमें सात दिन भावना देकर प्रज्वलित अंगारोंपर किंचित् तप्त करे । इसको पर्पटी रस कहते हैं. इसमेंसे चार रत्ती प्रमाण हरड,

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