रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोंठ और गिलोयके क्वाथके साथ सेवन करनेसे कफज्वर सर्वथा नष्ट होजाता है ॥ ६६-६७ ॥ वातपित्तान्तक रस । मृतसूताभ्रमुस्तार्कतीक्ष्णमाक्षिकतालकम् । गन्धकं मर्दयेत्तुल्यं यष्टीद्राक्षामृतारसैः ॥ ६८ ॥ धात्रीशतावरीद्रावैर्द्रवैः क्षीरविदारिजैः । दिनंदिनं विभाव्याथ सिताक्षौद्रयुता वटी ॥ ६९ ॥ माषमात्रं निहन्त्याशु वातपित्तज्वरं क्षयम् । दाहं तृषां भ्रमं शोषं वातपित्तान्तको रसः ॥ सिताक्षीरं पिबेच्चानु यष्टीक्वाथसितायुतम् ॥ ७० ॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, नागरमोथा, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म, हरितालकी भस्म और शुद्ध गंधक यह सब औषधियें समान भाग लेकर अच्छे प्रकारसे खरल करे फिर मुलैठी, दाख, गिलोय, आमले, सतावर और दूधविदारी इन सब औषधियोंके क्वाथ और रसमें एक एक दिन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको शर्करा और शहदके साथ सेवन करनेसे वातपित्तज्वर, क्षय, दाह, तृषा, भ्रम और शोष आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको सेवन करके मिश्री मिला दूध मिश्री मिला मुलैठीका क्वाथ पान करे । इसको वात- पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ६८-७० ॥ विश्वेश्वर रस । मृतसूतार्कतीक्ष्णञ्च तालं गन्धञ्च कट्फलम् । मेषशृङ्गी वचा शुण्ठी भार्गी पथ्या च बालकम्॥७१॥ धान्यकं मर्दयेत्तुल्यं पर्पटोत्थद्रवैर्दिनम् । मद्यं माषं लिहेत्क्षौद्रैः कफपित्तमदात्यये ॥ ७२ ॥