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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( १२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोंठ और गिलोयके क्वाथके साथ सेवन करनेसे कफज्वर सर्वथा नष्ट होजाता है ॥ ६६-६७ ॥ वातपित्तान्तक रस । मृतसूताभ्रमुस्तार्कतीक्ष्णमाक्षिकतालकम् । गन्धकं मर्दयेत्तुल्यं यष्टीद्राक्षामृतारसैः ॥ ६८ ॥ धात्रीशतावरीद्रावैर्द्रवैः क्षीरविदारिजैः । दिनंदिनं विभाव्याथ सिताक्षौद्रयुता वटी ॥ ६९ ॥ माषमात्रं निहन्त्याशु वातपित्तज्वरं क्षयम् । दाहं तृषां भ्रमं शोषं वातपित्तान्तको रसः ॥ सिताक्षीरं पिबेच्चानु यष्टीक्वाथसितायुतम् ॥ ७० ॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, नागरमोथा, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म, हरितालकी भस्म और शुद्ध गंधक यह सब औषधियें समान भाग लेकर अच्छे प्रकारसे खरल करे फिर मुलैठी, दाख, गिलोय, आमले, सतावर और दूधविदारी इन सब औषधियोंके क्वाथ और रसमें एक एक दिन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको शर्करा और शहदके साथ सेवन करनेसे वातपित्तज्वर, क्षय, दाह, तृषा, भ्रम और शोष आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको सेवन करके मिश्री मिला दूध मिश्री मिला मुलैठीका क्वाथ पान करे । इसको वात- पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ६८-७० ॥ विश्वेश्वर रस । मृतसूतार्कतीक्ष्णञ्च तालं गन्धञ्च कट्फलम् । मेषशृङ्गी वचा शुण्ठी भार्गी पथ्या च बालकम्॥७१॥ धान्यकं मर्दयेत्तुल्यं पर्पटोत्थद्रवैर्दिनम् । मद्यं माषं लिहेत्क्षौद्रैः कफपित्तमदात्यये ॥ ७२ ॥

भाषाटीकासहित । ( १२३ ) रसो विश्वेश्वरो नाम प्रोक्तो नागार्जुनेन च । काकमाचीरसं चानु सैन्धवेन युतं पिबेत् ॥७३॥ पारेकी भस्म, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध हरितालभस्म, शुद्ध गंधक, कायफल, मेढाशिंगी, वच, सोंठ, भारंगी, हरड़, सुगंध- वाला और धनिया यह सब औषधि समान भाग लेकर पित्तपापड़ेके क्वाथमें अच्छे प्रकार खरल करके एक दिन भावना देवे । फिर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । नित्य प्रति एक गोली शहदके साथ सेवन करनेसे कफज्वर, पित्तज्वर और मदात्ययरोग नष्ट होता है । इस औषधिका सेवन करके मकोयके रसको सेंधानमकके साथ पान करे । इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं । इसको स्वयं नागार्जुनसिद्धने कहा है ॥ ७१–७३ ॥ शीतारि रस । पारदं गन्धकं शुद्धं टंकणञ्च समं समम् । पारदाद् द्विगुणं देयं जैपालं तुषवर्जितम् ॥ ७४ ॥ सैन्धवं मरिचं चिञ्चात्वग्भस्मशर्करापि च । प्रत्येकं सूतकं तुल्यं जम्बीरैर्मर्दयेद्दिनम् ॥ ७५ ॥ द्विगुञ्जस्तप्ततोयेन वातश्लेष्मज्वरापहः । रसः शीतारिनामायं शीतज्वरहरः परः ॥ ७६ ॥ पारा, गंधक और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेवे; शुद्ध जमालगोटे दो भाग लेवे तथा सेंधानमक, कालीमिरच, इमलीकी छालकी भस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिकी एक एक गोली गरम जलके साथ पान करनेसे वातश्लेष्मज्वर और शीतज्वर नष्ट होता है । इसका नाम शीतारि रस है ॥ ७४–७६ ॥

( १२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । चिन्तामणि रस । रसविषगन्धकटंकणताम्रयवक्षारकव्योषम् । तालकफलत्रयञ्च क्षौद्रैः खलु शतं वारान् ॥ ७७ ॥ संमर्द्य रक्तिकामितवटिकाः कार्या भिषग्भिः प्राज्ञैः । शुण्ठीपिष्टेन सममेकां द्वे वाथवा तिस्रःसंप्राश्याः७८ पारा, विष, गन्धक, सुहागा, तांबेकी भस्म, जवारखार, त्रिकूटा, हरिताल और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर शहदमें अच्छे प्रकारसे १०० सौ वार खरल करके विद्वान् वैद्य एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । रोगीके दोषोंके बलाबलको विचार कर एक अथवा दो या तीन गोली सोंठके समभाग चूर्णमें मिलाकर देवे ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ नारिकेलजलमनुपेयं सेव्येतसैन्धवं जीरं तक्रं पथ्यं प्रयोक्तव्यम् । प्रशमयति सन्निपातज्वरं तथा जीर्णज्वरं विविधञ्च ॥ ७९ ॥ प्लीहानं चाध्मानकं कासं श्वासं वह्निमान्द्यञ्च । चिन्तामणी रसोऽयं किल स्वयं भैरवेन निर्दिष्टः ॥ ८० ॥ और ऊपरसे नारियलका जल पान करे । इस पर सेंधानम और जीरेका चूर्ण मिलाकर तक्रका पथ्य करे । इन गोलियोंके सेवन कर- नेसे सन्निपातज्वर, अनेक प्रकारका जीर्णज्वर, प्लीहा, आध्मान, खाँसी, श्वास और मंदाग्नि आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । यह चिन्तामणि रस स्वयं भैरवने निर्माण किया है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ रसं गन्धं विषं लोहं धूर्त्तबीजन्तु तत्समम् । द्वौ भागौ ताम्रवह्निं च व्योषचूर्णञ्च तत्समम् ॥८१॥ जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसैर्युतम् । अस्यानुपानेन वटी ज्वरे देया प्रयत्नतः ॥ ८२ ॥

भाषाटीकासहित । ( १२५ ) गुञ्जाद्वयं वटीं खादेत्सद्योज्वरं व्यपोहति । वातिकं पैत्तिकञ्चापि श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥८३॥ ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च चातुर्थिकविपर्ययम् । असाध्यञ्चापि साध्यञ्च ज्वरञ्चैवातिदुस्तरम् ॥ ८४॥ अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णे च आध्मानेऽनिलसम्भवे । अतिसारे छर्दिते च अरोचकनिपीडिते ॥ ८५ ॥ ज्वरान्सर्व्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा । चिन्तामणिरसो नाम सर्व्वज्वरं व्यपोहति ॥ ८६ ॥ अन्यमत–पारा १ भाग, गंधक १ भाग, विष १ भाग, लोहभस्म १ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग, तांबेकी भस्म २ भाग, चीतेकी जड़ २ भाग और त्रिकुटेका चूर्ण २ भाग लेवे, इन सबको एकत्र करके जम्भीरीनींबूकी मज्जा (गुद्दा) और अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली उचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे शीघ्र ही ज्वर नष्ट हो जाता है। इस औषधिके सेवनसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, ऐकाहिक, द्व्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक और इनके विपर्यय ज्वर एवं साध्य और असाध्य, अत्यंत दुस्तरज्वर, मंदाग्नि, अजीर्ण, आध्मान, अतीसार, वमन और अरुचि विनष्ट होती हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे सूर्योदयसे अंधकार नाश होनेके समान सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसको चिंतामणि रस कहते हैं ॥ ८१–८६ ॥ अथ सन्निपातज्वर पर । कुलवधू । शुद्धसूतं मृतं ताम्रं मृतं नागं मनःशिला । तुत्थकं तस्य तुल्यांशं दिनमेकं विमर्दयेत् ॥ ८७ ॥

( १२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । द्रवैश्चोत्तरवारुण्याश्चणमात्रा वटी कृता । सन्निपातं निहन्त्याशु नस्यमात्रेण दारुणम् । एषा कुलवधूनाम जले घृष्ट्वा प्रयोजयेत् ॥ ८८ ॥ अब सन्निपातज्वरकी चिकित्सा कहते हैं-शुद्ध पारा, तांबेकी भस्म, सीसेकी भस्म, शुद्ध मैनशिल और शुद्ध तूतिया यह सब औषधि समान भाग लेकर इन्द्रायनकी जड़के रसमें एक दिन खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । एक गोलीको जलमें घिसकर नास देवे । इससे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ जयमंगल रस । भस्मसूताभ्रकं तारं मुण्डतीक्ष्णालमाक्षिकम् । वह्निटंकणकव्योषं समं संमर्दयेद्दिनम् ॥ ८९ ॥ पाठानिर्गुण्डिकायष्टीबिल्वमूलकषायकैः । ततो मूषागतं रुद्ध्वा विपचेद्भूधरे पुटे ॥ ९० ॥ माषैकं दशमूलस्य कषायेण प्रयोजयेत् । अञ्जनेनाथवा नस्यात्सन्निपातं जयेद् ध्रुवम् ॥ ९१ ॥ पारद भस्म या रससिन्दूर, अभ्रककी भस्म, चांदीकी भस्म, मुण्ड- लोह भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, हरिताल भस्म, सोनामाखी भस्म, चित्र- ककी जड़, सुहागा और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर पाठ, सम्हालू, मुलैठी और बेलकी जड़के क्वाथमें एक दिन खरल करके सुखा लेवे । फिर मूषामें बंद करके भूधर यन्त्रमें पुटपाककी विधिसे पकावे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर दशमूलके क्वाथसे सेवन करे । अथवा अंजन अथवा नस्यमें प्रयोग करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८९-९१ ॥ नस्य भैरव । मृतसूतार्कतीक्ष्णाग्निं टंकणं खर्परं समम् ।

भाषाटीकासहित । ( १२७ ) सव्योषमर्कदुग्धेन दिनं संमर्दयेद्दृढम् । अर्कक्षीरयुतं नस्यं सन्निपातहरं परम् ॥ ९२ ॥ पारद भस्म या रससिन्दूर, तांबेकी भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, चीतेकी जड़, सुहागा, खपरिया और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके दूधमें एक दिन खरल करके गोली बनावे । फिर इन गोलियोंको आकके दूधमें भावना देकर नस्य ग्रहण करे तो सन्नि- पातज्वर नष्ट होता है ॥ ९२ ॥ अंजन भैरव । सूततीक्ष्णकणागन्धमेकांशं जयपालकम् । सर्वैस्त्रिगुणितं जम्बुवारिणा च सुपेषितम् ॥ नेत्राञ्जनेन हन्त्याशु सर्वोपद्रवमुद्धतम् ॥ ९३ ॥ पारा, तीक्ष्णलोह भस्म, पीपल और गंधक यह सब औषधि एक एक भाग और जमालगोटे सबसे तिगुने लेवे, इन सबको एकत्र करके जामुनके रसमें खरल करके नेत्रोंमें आंजनेसे सन्निपातज्वर और अत्यंत वृद्धिको प्राप्त हुए सन्निपातके उपद्रव दूर होते हैं ॥ ९३ ॥ गन्धेशं लशुनाम्भोभिर्मर्दयेद्याममात्रकम् । तस्योदकेन संयुक्तं नस्यं तत्प्रतिबोधकृत् । मरिचेन समायुक्तं हन्ति तन्द्राप्रलापकान् ॥ ९४ ॥ गंधक १ भाग और पारा १ भाग इन दोनोंकों एकत्र खरल करके कज्जली बनावे । फिर लहसुनके रसमें एक प्रहर खरल करे । फिर इसको लहसुनके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे संज्ञा रहित सन्निपात रोगी भी संज्ञाको प्राप्त होता है । काली मिर्चोंके साथ इस औषधिकी नस्य देनेसे तन्द्रा और प्रलाप दूर होते हैं । इसे अंजनरस कहते हैं॥९४

: it looks like 'आं'! Wait, DOES it look like 'आ'? Wait, let me look really closely at : "मासे, धतूरेके पत्तोंका रस ४ मासे, [???] रस ४" Wait: Character 1: looks like 'भ'? No, wait, look at 'अ' in 'अंजन' [L5, L8]: Top curve, bottom curve, middle bar connecting to vertical line. In : top curve, bottom curve, middle bar connecting to vertical line, then an 'ा' (aa matra) with an anusvara 'ं' on top! Wait, is that 'आं'?! Why would it be 'आंगरेका'? Wait, could it be 'भांगरेका'? Look at the top of the character: Is there a loop like 'भ'? No! There is NO loop! Wait, is there an open top like 'भ'? No, the top bar covers the entire letter, just like 'अ' or 'आ' (or wait, in modern Hindi sometimes 'भ' is covered, but here top bar of 'भ' in 'भाग' has a broken bar!). In 'भाग' , the top bar is broken over the left of 'भ'! In 'भांगरेका'? The top bar is NOT broken, OR is it? Wait, look at the left

भाषाटीकासहित । ( १२९) ज्वर और कोष्ठगतज्वर नष्ट होते हैं। जो इस औषधिके सेवन कर- नेसे शरीरमें सन्ताप हो तो नारियलका जल पीना चाहिये। जो राईकी बराबर गोली गुण न करे तो एक एक रत्तीकी गोली बनावे। इसको सन्निपातनाशक त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ ९६-९९ ॥ स्वच्छन्द भैरव रस । रसगन्धकयोः शाणं प्रत्येकं कज्जलीकृतम् । सुवर्णमाक्षिकं शाणं शुद्धञ्चैकत्र कारयेत् ॥१००॥ रुद्रजटा सिन्दवारो नागरामलकी तथा । विषकण्टालिका चैषां स्वरसं शाणमात्रकम्॥१०१॥ दत्त्वा संशोध्य संमर्द्य कार्या मुद्गसमा वटी । आर्द्रकस्य रसैः पेया जीरकञ्चानु भक्षयेत् ॥१०२॥ स्वच्छन्दो भैरवाख्योऽयं सन्निपातोग्रहन्मतः । ग्रहणीसूतिकातङ्कं नाशयेदविचारतः ॥ १०३ ॥ पारा ४ मासे और गन्धक ४ मासे लेवे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर उसमें ४ मासे शुद्ध सोनामाखीभस्म फिर रुद्रजटा, सम्हालू, सोंठ, आमले और बांझककोड़े इन प्रत्येकके चार चार मासे स्वरसमें खरल करके मूंगके बराबर गोलियें बनावे। इनमेंसे एक गोली अदर- खके रसके साथ खावे ऊपरसे थोड़ासा जीरा चबावे तो यह स्वच्छन्द भैरव रस उग्र सन्निपातको दूर करता है एवं ग्रहणी तथा प्रसूति रोगको झट नष्ट कर देता है ॥ १००-१०३ ॥ शीतांग सन्निपातके लक्षण । शीतं शरीरं शीताङ्गे छर्द्यतीसारकम्पनम् । क्षुद्विघातोऽङ्गमर्दश्च हिक्का श्वासः श्रमोऽरतिः ॥ सर्वांगशिथिलत्वञ्च सन्निपाते प्रजायते ॥१०४॥

( १३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शीतांग सन्निपातमें मनुष्यका शरीर अत्यंत शीतल होता है, तथा वमन, अतिसार, कम्प, क्षुधाका नाश, अंगमर्दन, शरीरकी पीड़ा, हिचकी, श्वास, श्रम, बेचैनी और संपूर्ण शरीरमें शिथिलता होती है ॥ १०४ ॥ आनन्द भैरव । हिंगुलञ्च विषं व्योषं मरिचं टंकणं कणा । जातीकोषसमं चूर्णं जम्बीरद्रवमर्दितम् ॥ १०५ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यात्खादेदार्द्रकसंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं वापि सन्निपाते सुदारुणे ॥ १०६ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति तथाऽतीसारनाशनः । जीर्णज्वरहरश्चैव तथा सर्वाङ्गभेदकः ॥ १०७॥ सिंगरफ, विष, त्रिकुटा, कालीमिरच, सुहागा, पीपल और जाय- फल यह सब औषधि समान भाग लेकर जम्भीरीनींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली अथवा तीन गोली लेकर अदरखके साथ घोरतर सन्निपातज्वरमें देवे । यह औषधि आठ प्रकारके ज्वर, अतिसार, जीर्णज्वर, शरीर- भेद और आमवातादि रोगोंको नष्ट करती है । इसको आनन्दभैरव कहते हैं ॥ १०५-१०७ ॥ आनंद भैरवी । विषं त्रिकटुकं गन्धं टंकणं मृतशुल्वकम् । धूस्तूरस्य च बीजानि हिंगुलं नवमं स्मृतम् ॥१०८॥ एतानि समभागानि दिनैकं विजयाद्रवैः । मर्दयेच्चणकाभां तु वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १०९ ॥

भाषाटीकासहित । ( १३१ )

भक्षयेच्च पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् । सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥११० विष, त्रिकुटा, गंधक, सुहागा, ताम्रभस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ यह नव ९ औषधि समान भाग लेकर भांगके रसमें अथवा जयंतीके रसमें खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे। एक गोली खाकर और ऊपरसे आककी जड़का क्वाथ पीवे। त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है। इसको आनन्दभैरवीरस कहते हैं ॥ १०८-११० ॥ शीतांगे सन्निपाते वा सामान्ये वा त्रिदोषजे । धान्याकं पिप्पली शुण्ठी कटुकी कण्टकारिका॥११॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं चतुर्गुञ्जा च पर्पटी । सन्निपातज्वरं हन्ति वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १२ ॥ मूलञ्च कटुरोहिण्याः समं बिल्वं सजीरकम् । दध्ना पिष्टं पिबेच्चानु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १३ ॥ धनिया, पीपल, सोंठ, कुटकी और कटेरीके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर शीतांग सन्निपात अथवा साधारण सन्निपातमें इन आनन्दभैरवी गोलियोंका सेवन करना चाहिये । अथवा चार रत्ती परिमाण पर्पटी रसको लेकर इसी अधिकारमें कहे हुए इसी क्वाथसे सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट होता है । समान भाग कुटकीकी जड़, बेल और जीरा इन औषधियोंको दहीमें पीसकर आनन्दभैरवी- रसके अंतमें अनुपान सेवन करे ॥ ११-१३ ॥ सन्निपातातिसारघ्नी पथ्यं शाकविवर्जितम् । आनन्दभैरवीं पीत्वा क्वाथं वरुणसम्भवम् ॥ १४ ॥ पाययेदश्मरीं हन्ति सप्तरात्रान्न संशयः । वागुजीसम्भवैस्तैलैर्वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १५ ॥

( १३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेहयेन्निष्कमात्रान्तु गलत्कुष्ठञ्च नाशयेत् । दधिमस्तुसिताक्षौद्रैः वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १६ ॥ भक्षयेन्मूत्रकृच्छ्रार्त्तो यवक्षारं सितान्वितम् । गोदुग्धं कथितञ्चानु शीतलं मधुना पिबेत् ॥ १७ ॥ गुञ्जामूलं पिबेत्क्षीरैरनुपानं प्रशस्यते । अनेन चानुपानैन वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ देया रुद्रजटाक्षौद्रैः सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १८ ॥ इस आनन्दभैरवी गोलीके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतीसार नष्ट होता है । इस औषधि पर शाकरहित पथ्य सेवन करे । इस औष- धिका सेवन करके ऊपरसे वरनेकी छालका क्वाथ पान करनेसे सात दिनमें अश्मरीरोग नष्ट होता है । बावचीके तेलके साथ निष्क प्रमाण इस औषधिके सेवन करनेसे गलत्कुष्ठ नष्ट होता है । मूत्रकृच्छ्ररोगी दहीके तोड़, मिश्री

भाषाटीकासहित । ( १३३ ) शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक १ भाग और शुद्ध विष आधा ,भाग लेवे । इन सब औषधियोंको मुसलीके रसमें तीन दिन तक खरल करे, फिर एक आतशी शीशीमें भरकर उसका मुख बंद करके ऊप- रसे सात वार कपड़मिट्टी करके सात वार सुखावे, पश्चात् कुम्भीपुटमें पकावे, जब स्वांगशीतल होजावे तब उसमेंसे निकाल कर एक दिन खरल करे ॥ १९-२१ ॥ अजाजीजीरकं हिंगुसर्जिकाटङ्गणैर्युतम् । गुग्गुलुः पञ्चलवणं यवक्षारो यमानिका ॥ २२ ॥ मरिचं पिप्पली चैव प्रत्येकञ्च समांशतः । एषां कषायेण पुनर्भावयेत्सप्तधाऽऽतपे ॥ २३ ॥ नागवल्लीदलैर्युक्तं पञ्चगुञ्जं रसेश्वरम् । दद्यान्नवज्वरे तीव्रे कोष्णं वारि पिबेदनु ॥ २४ ॥ प्राणेश्वररसो नाम्ना सन्निपातप्रकोपजित् । शीतज्वरे दाहपूर्वे गुल्मे शूले त्रिदोषजे ॥ २५ ॥ वाञ्छितं भोजनं दद्यात्कुर्याच्चन्दनलेपनम् । तावदेव प्रशमनो नानातीसारनाशनः । भवेच्च नात्र संदेहः स्वास्थ्यञ्च लभते नरः ॥ २६ ॥ फिर कालाजीरा और सफेद जीरा, हींग, सज्जी, सुहागा, गूगल, पांचों नमक, जवाखार, अजवायन, कालीमिरच और पीपल यह सब औषधि समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर इनके क्वाथमें सात वार भावना देकर धूपमें सुखावे । इसमेंसे पांच रत्ती औषधि लेकर पानमें रखकर खावे और ऊपरसे गरम जल पीवे । इसको प्राणेश्वर रस कहते हैं । इसके सेवन करनेसे नवज्वर, सन्निपातज्वर, शीतज्वर, दाहपूर्वकज्वर, गुल्म, शूल और त्रिदोषज रोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके इच्छानुसार पथ्य सेवन करे और शरीर पर चन्दनादिक

( १३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेप करे। यह औषधि अनेक प्रकारके अतिसारोंको नष्ट करती है तथा स्वस्थताको उत्पन्न करती है ॥ २२-२६ ॥ सन्निपातभैरव । ताम्रं गन्धं रसं श्वेतगुञ्जा मरिचपूतना । समीनपित्तजैपालांस्तुल्यानेकत्र मर्दयेत् ॥ २७ ॥ गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य नवज्वरहरं परम् । ज्वरांकुशः सन्निपातभैरवोऽयं प्रकाशितः ॥ २८ ॥ तांबा भस्म, गंधक, पारा, सफेदचोंटली, कालीमिरच, हरड़, रौहू- मछलीका पित्ता और जमालगोटे इन सबको समान भाग लेकर एकत्र अच्छे प्रकारसे खरल कर इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करनेसे तत्काल नवीनज्वर नष्ट होजाता है। यह ज्वररूपी हस्तीके लिये अंकुशके समान है। इसको सन्निपातभैरव रस कहते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ शीतभञ्जी रस । रसो हिंगुलगन्धश्च जैपालं सम्मितं त्रिभिः । दंतीक्वाथेन संमर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ २९ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् । नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ १३० ॥ शर्करादधिभक्तञ्च पथ्यं देयं प्रयत्नतः । शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुमुद्गरसो हितः । शीतभञ्जीरसो नाम सर्वज्वरकुलांतकः ॥ ३१ ॥ पारा, सिंगरफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे तीन भाग लेवे, इन सबको एकत्र दंतीके क्वाथमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है।

भाषाटीकासहित । ( १३५ ) इस औषधिके सेवन करनेसे एक प्रहरमें घोरतर नवीनज्वर नष्ट हो जाता है । इस औषधि पर मिश्री, दही और भात भोजन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् शीतल जल पीवे तथा गन्नेका रस और मूंगका यूष इस पर अत्यन्त हितकारी है । इसको शीतभंजी रस कहते हैं । यह शीतभंजी रस सब प्रकारके ज्वरोंको अन्तक- स्वरूप है ॥ २९-३१ ॥ उन्मत्त रस । रसं गन्धञ्च तुल्यांशं धूस्तूरफलजैर्द्रवैः । मर्दयेद्दिनमेकन्तु तुल्यं त्रिकटुकं क्षिपेत् । उन्मत्ताख्यो रसो नाम रस्यः स्यात्सन्निपातजित् ३२ सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युपैति च रोगिणम् । कस्तेन न कृतो धर्मः काञ्च पूजां न सोऽर्हति ॥३३॥ पारा १ भाग और गंधक १ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र धतूरेके फलोंके रसमें एक दिन खरल करे । फिर उसमें समान भाग त्रिकुटा मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करे । इसको उन्मत्त रस कहते हैं । इसकी नस्य ग्रहण करनेसे सन्निपात ज्वर नष्ट होजाता है । जो वैद्य इस सन्निपातरूपी समुद्रमें निमग्न हुए रोगीका उद्धार करता है उसने कौनसा धर्म नहीं किया और वह कौनसी पूजाके योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ मृतसञ्जीवन रस । म्लेच्छस्य भागाश्चत्वारो जैपालस्य त्रयो मताः । द्वौ भागौ टंकणस्यैव भागैकममृतस्य च ॥ ३४ ॥ तत्सर्वं मर्दयेच्छ्लक्ष्णं शुष्कं यामं भिषग्वरः । शृङ्गवेराम्बुना देयं व्योषचित्रकसैन्धवैः ॥ ३५ ॥ माषद्वयमितन्तापं हरत्येव विनिश्चयः । घनसारण सारेण चन्दनेन विलेपनम् ॥ ३६ ॥

( १३६ ) रसेंद्रसारसंग्रह । विदध्यात्कांस्यपात्रे च सेचयेद्रोगिणं भिषक् । शाल्यन्नं तक्रसहितं भोजयेदिक्षुसंयुतम् ॥ ३७ ॥ सन्निपाते महाघोरे त्रिदोषे विषमज्वरे । आमवाते वातशूले गुल्मे प्लीह्नि जलोदरे । शीतपूर्वे दाहपूर्वे विषमे संततज्वरे ॥ ३८ ॥ अग्निमांद्ये च वाते च प्रयोज्योऽयं रसेश्वरः । मृतसंजीवनो नाम विख्यातोऽयं रसायने ॥ ३९ ॥ सिंगरफ ४ भाग, जमालगोटे ३ भाग, सुहागा २ भाग और विष एक भाग लेवे, इन सबको एकत्र खरल करके सोंठके क्वाथमें एक प्रहर खरल करके सुखा लेवे। इस औषधिको त्रिकुटा, चित्रक और सेंधा नमकमें मिला करके दो मासे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन करे या ऊपरसे अदरखका रस पान करे इससे ज्वरका सन्ताप अवश्य दूर होजाता है। इस औषधिसेवनके पश्चात् कपूर और चन्द- नसे रोगीके शरीरको लिप्त करे तथा रोगीकी नाभिके ऊपर काँसीका पात्र स्थापन करके उसमें शीतल जलकी धारा छोड़े । पश्चात् तक्र और ईखके रसके साथ शालि चावलोंका भात खाये । यह औषधि घोरतर सन्निपातज्वर, त्रिदोषज, विषमज्वर, शीतपूर्व और दाहपूर्व, विषमज्वर, सततज्वर, आमवात, वातजन्यशूल, गुल्म, प्लीहा, जलोदर, मन्दाग्नि और वातरोगको दूर करती है। यह उत्तम रसायन है॥३४-३९॥ स्वल्प वडवानल रस । शुद्धताम्रस्य भागैकं मरिचस्य तथैव च । विषं तत्तुल्यकं दद्यात्सर्वं श्लक्ष्णं सुचूर्णितम् ॥ ४० ॥ लांगलीरससंयुक्तं तत्सर्वं पुटके पचेत् । रक्तिकाद्वितयं वापि त्रितयं वा प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासहित । ( १३७ ) दोषे व्योषसमायुक्तस्त्रिदोषशमनो भवेत् । भक्षयेत्पवने चोग्रे वडवानलसंज्ञितम् ॥ ४२ ॥ ताम्रभस्म १ भाग, मरिच १ भाग, विष २ भाग इन औषधियोंको एकत्र करके कलिहारीके रसमें खरल करके पुटपाक करे । रोगीके दोषोंका बलाबल विचार कर दो रत्ती अथवा तीन रत्ती औषधि सेवन करे । इसको त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज्वर शमन होता है । पवनकी अधिकतामें यह वडवानलसंज्ञित रस भक्षण करना चाहिये ॥ १४०-१४२ ॥ बृहद्वडवानल रस । सूतकं गन्धकं चैव हरितालं मनःशिला । अभ्रकं वत्सनाभञ्च दारुजङ्गमजं विषम् ॥ ४३ ॥ जैपालात्सार्द्धशतकं सर्वं संचूर्ण्य मर्दयेत् । मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४४ ॥ वटिकां शीततोयेन कुर्याद्गुञ्जाप्रमाणतः । वडवानलनामाऽयं नारिकेलजलेन वै । रक्षयेत्सन्निपातार्तं मृत्युस्तस्यान्मुखो भवेत् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरिताल भस्म, मैनसिल भस्म, अभ्रक- भस्म, वत्सनाभविष, काष्ठविष और साँपका विष यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले, जमालगोटे १५० बीज इन सबका एकत्र चूर्ण करके मत्स्य, महिष, मयूर और बकरी इनके पित्तमें अलग अलग भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । सन्निपातसे पीड़ित रोगीको यह औषधि शीतल जल अथवा नारियलके जलके साथ सेवन करनेसे मृत्यु दूर भाग जाती है ॥ ४३-४५ ॥ सूचिकाभरण रस । रसगन्धकनागं च विषं स्थावरजंगमम् । मात्स्यवाराहमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४६ ॥

( १३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्तितः । सूचिकाग्रेण दातव्यः सन्निपातनिबर्हणः ॥ ४७ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सीसाभस्म, स्थावर और जंगम विष ( सिंगिया विष और गरल ) यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र मछलीके पित्त, सुअरके पित्त, मोर और बकरेके पित्तमें अलग अलग भावना देवे । इसको सूचिकाभरण रस कहते हैं । यह औषधि स्वयं भैरवने कही है । इस औषधिमेंसे सुईके अग्रभागकी बराबर सेवन करे । यह सन्निपातको नष्ट करती है, इसको कोई सूचीसे शरी- रमें लगाते हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चानन रस । शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं दैत्येन्द्ररक्तं रविः, पक्षौ सागरलोचनं शशियुगं भागोऽर्कसंख्यान्वितः। खल्ले तत्परिमर्दितं रविजलैर्गुञ्जैकमात्रं ददेत्, सिंहोऽयं ज्वरदंतिदर्पदलनः पंचाननाख्यो रसः४८॥ विष २ भाग, कालीमिरच ७ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, सिंगरफ २ भाग और तांबाभस्म १२ भाग इन सब औषधियोंको आकके मूलके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं, ज्वररूपी मत्तहस्तीके दर्पको दलनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है ॥ ४८ ॥ त्रिदोषनीहाररवि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनानि घर्मे । रसाष्टभागं त्वमृतं च दद्याद्विमर्दयेद्वह्निरसेन किंचित् ॥ पिबेत्तु सम्भावित एष देय- स्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्यः ॥ ४९ ॥

भाषाटीकासहित । ( १३९) शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग इन दोनोंको एकत्र रगड़ चित्रकके रसमें आठ दिन तक भावना देवे और खरल करे, फिर शुद्ध पारेसे आठवां भाग विष मिलाकर फिर चित्रकके रसमें खरल करे । इस औषधिका त्रिदोषजज्वरमें प्रयोग करै । इसको त्रिदोषनीहाररवि रस कहते हैं । यह त्रिदोषरूपी नीहारको नष्ट करनेके लिये सूर्य्यके समान है ॥ ४९ ॥ रसराजेन्द्र रस । पलं शुद्धस्य सूतस्य पलं ताम्रमयस्तथा । अभ्रं नागं पलं वङ्गं पलं गन्धकतालकम् ॥ १५० ॥ पलं शुद्धविषं चूर्णं सर्वमेकत्र कारयेत् । मर्दयेत्काकमाच्याश्च आर्द्रकस्य रसेन च ॥ ५१ ॥ मात्स्यवाराहमायूरच्छागमाहिषपित्तकैः । मर्दयेद्दिनभिन्नं च त्रिकटोरम्बुभिस्तथा ॥ ५२ ॥ शुद्ध पारा, तांवा भस्म, लोहा भस्म, अभ्रक भस्म, सीसा भस्म, वंग भस्म, शुद्ध गंधक, शुद्ध हरिताल भस्म और शुद्ध विष यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बारीक चूर्ण करके मकोयके रसमें और अदरखके रसमें खरल करे । फिर मछली, सूअर, मोर, बकरी, और भैंस इनके पित्तोंमें अलग अलग भावना देकर पश्चात् त्रिकुटेके क्वाथमें भावना देवे ॥ १५०-१५२ ॥ सिद्धोऽयं रसराजेन्द्रो धन्वन्तरिसुसंस्कृतः । गुञ्जामात्रं रसं दद्यात्सुरसारससंयुक्तम् ॥ ५३ ॥ मेघवारिप्रवाहेण धारितं वारि मस्तके । निवारो यदा दाहस्तदा देया च शर्करा ॥ ५४ ॥ भोजनं दधिसंयुक्तं वारमेकन्तु दापयेत् ।

( १४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ईश्वरेण हतः कामः केशवेन च दानवः । पावकेन यथा शीतमनेन च तथा ज्वरः ॥ ५५ ॥ इसको रसराजेन्द्र कहते हैं । स्वयं धन्वन्तरिजीने यह औषधि कही है । एक रत्ती परिमाण इसको तुलसीके पत्तोंके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेके पश्चात् रोगीके शिरपर जलकी धारा- ओंको प्रदान करे,यदि दाह शांत न हो तब शर्करा सेवन करनेके लिये देवे । दिनमें केवल एक बार दहीके साथ भोजन करे । जिस प्रकार महादेवके द्वारा कामदेव, कृष्णके द्वारा दानवकुल और अग्निके द्वारा शीत नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके द्वारा संपूर्ण ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ५३-५५ ॥ मृतसञ्जीवन रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले तत्कज्जलीकृतम् । अभ्रलोहकयोर्भस्म ताम्रभस्म समं समम् ॥ ५६ ॥ विषं तालं वराटञ्च शिलाहिंगुलचित्रकान् । हस्तिशुण्डी चातिविषा त्र्यूषणं हेममाक्षिकम् ॥५७॥ चूर्णं विमर्दयेद्भावैरार्द्रकस्य दिनत्रयम् । निर्गुण्डीं विजयाद्रावैस्त्रिदिनं मर्दयेत्पुनः ॥ ५८ ॥ काचकूप्यां निवेश्याथ वालुकायन्त्रगे पचेत् । द्वियामान्ते समुद्धृत्य मर्दयेदार्द्रकैर्द्रवैः ॥५९॥ मृतसञ्जीवनो नाम रसोऽयं शंकरोदितः । मृतोऽपि सन्निपातार्त्तो जीवत्येव न संशयः॥१६०॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग इन दोनोंको खल्वमें मर्दन करके कज्जली बनावे । फिर अभ्रक,लोहा और तांबा इन सबकी भस्म, शुद्ध विष, शुद्ध हरिताल भस्म, कौड़ी भस्म, मैनशिल, सिंग्रफ,

भाषाटीकासहित । ( १४१ ) चित्रक, हाथीशुण्डी, अतीस, त्रिकुटा और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग ग्रहण करके उत्तम विधिसे चूर्ण करके उपरोक्त कज्जलीमें मिला देवे, फिर इसको अदरखके रसमें तीन दिनतक खरल करके फिर सम्हालूके रसमें तीन दिनतक खरल करे, पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें तीन दिन तक खरल करे । फिर इस औषधिको आतसी शीशीमें भरकर वालुकायन्त्रमें दोपहर तक पकावे । फिर इसको अदर- खके रसमें खरल करे । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं । इसको स्वयं महादेवने प्रकाशित किया है । इस औषधिके सेवन करनेसे मृत्युको प्राप्त हुआ सन्निपातरोगी भी आरोग्य होजाता है ॥ १५६-२६० ॥ गन्धक कज्जली । कण्टकारी सिन्धुवारस्तथा नाटकरञ्जकम् । अमीषां रसमादाय कृत्वा खर्परखण्डके ॥ ६१ ॥ प्रक्षिप्य गन्धकं तत्र ज्वालां मृद्वग्निना दहेत् । गन्धके स्नेहतापन्ने पारदं तत्समं क्षिपेत् ॥ ६२ ॥ मिश्रीकृत्य ततो द्वाभ्यां द्रवं तमवतारयेत् । आमर्दयेत्तथा तं तु यथा स्यात्कज्जलप्रभम् ॥ ६३ ॥ ततस्तु रक्तिकामस्य जीरकस्य च माषकम् । माषकं लवणस्यापि पर्णे कृत्वा प्रदापयेत् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे जलमुष्णं पिबेदनु ॥ ६४ ॥ कटेरी, सम्हालू और करंजके रसमें गंधकको डालकर अग्निके द्वारा गलावे, जब अच्छे प्रकारसे गल जाये तब बराबरका शुद्ध पारा मिला देवे । पश्चात् अच्छे प्रकारसे दोनोंको एकत्र खरल करके कजली बनावे । इसमेंसे प्रति दिन एक रत्ती परिमाण लेकर जीरेका चूर्ण एक मासा और सेंधानमक एक मासा मिलाकर पानके साथ सेवन करे । घोर त्रिदोषज्वरमें इस औषधिका सेवन करके ऊपरसे गरम जलका अनुपान करे ॥ ६१-६४ ॥ ६